वाराणसी संगोष्ठी: विद्वानों ने कहा- जब तक मूल्य आचरण में न बदलें, धर्म का कोई अर्थ नहीं
वाराणसी में आयोजित विश्व संगोष्ठी में विद्वानों ने कहा कि जब तक धार्मिक मूल्य आचरण में नहीं उतरते, तब तक धर्म का कोई अर्थ नहीं है।

धर्म और दर्शन केवल किताबों या चर्चाओं तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि उन्हें इंसान के व्यवहार में दिखना चाहिए। यह बात आध्यात्मिक नगरी वाराणसी में आयोजित 'प्राचीन ज्ञान और आधुनिक चुनौतियां' (Ancient Wisdom for Modern Challenges) विषय पर आधारित विश्व संगोष्ठी में दुनिया भर से आए दार्शनिकों और विद्वानों ने कही। इस आयोजन में दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आए शिक्षाविदों ने इस बात पर जोर दिया कि आज के वैश्विक संकटों का समाधान हमें अपनी पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों में ही मिलेगा।
संगोष्ठी के दौरान हिंदू, इस्लाम, ईसाई, बौद्ध और अफ्रीकी दर्शन जैसे विभिन्न वैश्विक परंपराओं के माध्यम से जलवायु परिवर्तन, संघर्ष समाधान और वैश्विक सहयोग जैसे गंभीर मुद्दों पर गहन चर्चा की गई। विद्वानों का मानना था कि आज की दुनिया को ऐसे साझा सिद्धांतों की जरूरत है जो जबरदस्ती के बजाय आपसी सहमति और सम्मान पर आधारित हों।
व्यवहार में बदलाव ही असली धर्म: विद्वानों के विचार
चिन्मय इंटरनेशनल फाउंडेशन की शैक्षिक निदेशक और संस्कृत विद्वान गौरी महुलिकर ने वाराणसी के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह शहर सदियों से ज्ञान और विमर्श का केंद्र रहा है। उन्होंने 'सत्यम, शिवम, सुंदरम' के सनातन सिद्धांत का जिक्र करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी धर्म की सैद्धांतिक शिक्षा तभी सार्थक है जब वह हमारे कर्मों में झलके। उन्होंने जोर देकर कहा, "कोई भी धर्म विचारों के मामले में अधूरा नहीं है; असली सवाल यह है कि क्या हम उन मूल्यों का पालन करते हैं। जब तक धार्मिक सिद्धांत शुद्ध दर्शन से निकलकर 'आचार' और 'व्यवहार' में नहीं बदलते, तब तक धर्म का कोई खास अर्थ नहीं रह जाता।"
वहीं, दक्षिण अफ्रीका की यूनिवर्सिटी ऑफ प्रिटोरिया के प्रोफेसर थैडियस मेट्ज़ ने कहा कि दुनिया को युद्ध और संसाधनों के वितरण जैसे मुद्दों को सुलझाने के लिए ऐसे मूल्यों की तलाश करनी होगी जिन्हें सभी पक्ष स्वीकार कर सकें। यूनिवर्सिटी ऑफ जोहान्सबर्ग की ज़हरा मैकडोनाल्ड ने इस्लामी परंपराओं का उल्लेख करते हुए 'शूरा' (परामर्श) और करुणा के महत्व को बताया। उन्होंने कहा कि एक असमान समाज में सबसे कमजोर वर्ग को साथ लेकर चलना और करुणा के साथ संवाद करना अनिवार्य है।
क्रॉस-कल्चरल फिलोसोफर कियारा रोब्बियानो ने संवाद की प्रक्रिया पर बात करते हुए कहा कि हमें एक-दूसरे की बात सुनने के लिए धैर्य रखना होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि संवाद केवल एकतरफा भाषण (मोनोलॉग) नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझने और मिलकर कुछ नया रचने की कोशिश होनी चाहिए।