यूपी में धान खरीद की रफ्तार सुस्त, प्रशासनिक लापरवाही से किसान बेहाल

उत्तर प्रदेश के अन्नदाता इस समय दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने खड़ी फसलों को तबाह कर दिया है, तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश धान खरीद की सुस्त रफ्तार ने उनकी कमर तोड़ दी है। खरीफ खरीद सीजन शुरू हुए 17 दिन बीत चुके हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सरकारी तंत्र पूरी तरह नाकाम नजर आ रहा है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति काफी चिंताजनक है। पीलीभीत, संभल और सीतापुर जैसे प्रमुख धान उत्पादक जिलों में कुल मिलाकर महज 600 क्विंटल धान की खरीद दर्ज की गई है, जो इस सीजन की मांग के मुकाबले ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। खरीद केंद्रों की जियो-टैगिंग का काम भी कछुए की चाल से चल रहा है। अब तक केवल 440 RFC, 510 PCF और 27 FCI केंद्रों सहित कुछ ही केंद्रों की टैगिंग हो पाई है, जिसके कारण खरीद प्रक्रिया शुरू होने में भारी देरी हो रही है।
प्रशासनिक अनदेखी और बिचौलियों का खेल
सिस्टम की इस विफलता का सबसे बुरा असर शाहजहाँपुर जैसे जिलों में दिख रहा है, जहां अब तक केवल 1,203 पंजीकरण हुए हैं और उनमें से सिर्फ 245 का सत्यापन हो पाया है। जब सरकारी केंद्रों पर खरीद नहीं हो रही, तो मजबूरन किसानों को अपनी मेहनत की फसल कौड़ियों के दाम मिलर्स और बिचौलियों को बेचनी पड़ रही है।
किसानों और जानकारों का आरोप है कि यह प्रशासनिक देरी जानबूझकर की जा रही है। DAP खाद की किल्लत और खरीद में देरी ने किसानों को इस कदर लाचार कर दिया है कि बिचौलिए इस स्थिति का फायदा उठा रहे हैं। आशंका जताई जा रही है कि कागजों पर तो 'बंपर' खरीद के आंकड़े दिखाए जाएंगे, लेकिन असल में किसान का शोषण हो चुका होगा।
इस पूरे मामले में शाहजहाँपुर, लखीमपुर खीरी, बरेली और फर्रुखाबाद के जिलाधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। किसानों का कहना है कि अधिकारी केवल खोखले आश्वासन दे रहे हैं, जबकि उनकी फसलें खेतों में खराब हो रही हैं और आर्थिक संकट गहराता जा रहा है।