गलत गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, यूपी सरकार को 6 लाख मुआवजा देने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने आगरा के एक व्यक्ति को 6 साल गलत जेल में रखने पर यूपी सरकार को 6 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है।

देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक निर्दोष व्यक्ति को 6 लाख रुपये का मुआवजा दे। यह मामला आगरा के रहने वाले अरुण उर्फ दीपक का है, जिसे बिना किसी ठोस सबूत के अपहरण और हत्या जैसे गंभीर आरोपों में छह साल तक जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को न्याय का मजाक करार दिया है।
यह पूरा मामला साल 2019 का है, जब आगरा के अछनेरा पुलिस स्टेशन में एक एफआईआर दर्ज की गई थी। अरुण पर अपहरण, हत्या और सबूत मिटाने के आरोप लगाए गए थे। हैरानी की बात यह है कि शुरुआती एफआईआर या जांच रिपोर्ट में अरुण का नाम तक नहीं था, लेकिन बाद में उसे गिरफ्तार कर लिया गया। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि अरुण की गिरफ्तारी महज एक धुंधली सीसीटीवी फुटेज और एक सह-आरोपी के बयान के आधार पर की गई थी।
पुलिस जांच पर कोर्ट की कड़ी नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गहरा असंतोष व्यक्त किया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जांच का मकसद सिर्फ किसी को सजा दिलाना नहीं, बल्कि सच्चाई तक पहुंचना होना चाहिए। कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली को खामियों से भरा बताया और कहा कि इस तरह की लापरवाही किसी व्यक्ति के जीवन के कीमती साल छीन लेती है।
अदालत ने आदेश दिया कि मुआवजा राशि एक महीने के भीतर दी जाए। यदि सरकार इस समय सीमा का पालन नहीं करती है, तो उसे 6 लाख रुपये पर 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। कोर्ट ने यह भी माना कि छह साल की आजादी के बदले 6 लाख रुपये बहुत कम हैं, लेकिन जवाबदेही तय करना जरूरी है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फैसले की कॉपी उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) और राज्य के गृह सचिव को भेजने का निर्देश दिया है, ताकि पुलिसकर्मियों को जांच प्रक्रियाओं का सही प्रशिक्षण दिया जा सके और भविष्य में ऐसी गलतियां न हों।