यूपी के अस्पतालों में दवाओं की कीमतों में भारी खेल, FSDA की जांच में हुआ बड़ा खुलासा

उत्तर प्रदेश के अस्पतालों में मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाकर दवाओं की कीमतों में भारी हेरफेर किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन (FSDA) द्वारा की गई एक विस्तृत जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। जांच में पाया गया कि अस्पतालों की फार्मेसी में एक ही ब्रांड की दवा की अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) और उसकी खरीद कीमत में 27,390 रुपये तक का अंतर है।
यह खुलासा 5 अक्टूबर से 8 अक्टूबर 2026 के बीच 214 अस्पतालों से जुटाए गए आंकड़ों के विश्लेषण के बाद हुआ है। जांचकर्ताओं ने पाया कि 167 अलग-अलग दवाओं की कीमतों में भारी विसंगतियां हैं। उदाहरण के तौर पर, फंगल इन्फेक्शन के लिए इस्तेमाल होने वाले 'कैस्पोफंगिन 70mg' इंजेक्शन को 800 रुपये में खरीदा गया, लेकिन उसकी MRP 21,230 रुपये रखी गई, जो कि खरीद मूल्य से करीब 26.5 गुना ज्यादा है। एक अन्य मामले में 'पॉलीमिक्सिन-बी' इंजेक्शन की खरीद कीमत महज 74.09 रुपये थी, जबकि उसकी MRP लगभग 4,981 रुपये थी, जो कि 67 गुना अधिक है।
मेडिकल डिवाइस और महंगी दवाओं में भी लूट
कीमतों में यह अंतर सिर्फ दवाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि मेडिकल उपकरणों में भी देखा गया। एक 'थ्री-वे स्टॉपकॉक' जिसे 6.40 रुपये में खरीदा गया, उसकी MRP 163 रुपये पाई गई। फाइजर की दवा 'इनोटुजुमाब ओज़ोगैमिकिन 1mg' (Besponsa) में सबसे ज्यादा 27,390 रुपये का अंतर देखा गया। इस विश्लेषण में रिलायंस लाइफ साइंसेज, जुवेंटस और लुपिन जैसे निर्माताओं की दवाएं भी शामिल थीं।
FSDA अधिकारियों ने इसे उपभोक्ता मूल्य निर्धारण में एक गंभीर अनियमितता बताया है। नियमों के मुताबिक, वार्षिक मूल्य संशोधन की सीमा 10 प्रतिशत है, लेकिन वर्तमान आंकड़े बताते हैं कि कीमतें रेगुलेशन के बजाय बाजार की मांग और मरीज की जरूरत के हिसाब से तय की जा रही हैं। ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क (AIDAN) की सह-संयोजक डॉ. मीरा शिवा के अनुसार, फार्मा बाजार का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा प्रभावी मूल्य नियंत्रण से बाहर है, जिसका फायदा अस्पताल उठा रहे हैं।
इस स्थिति को देखते हुए यूपी FSDA ने केंद्र सरकार और नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) से पारदर्शिता लाने की अपील की है। विभाग अब वाराणसी के बीएचयू और निजी अस्पतालों से 50 दवाओं के नमूने लेकर उनकी गुणवत्ता और बाहरी रिटेल दरों से तुलना कर रहा है। गौरतलब है कि कर्नाटक FSDA ने भी इसी तरह की विसंगतियां पाई थीं। अब मांग की जा रही है कि 'ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013' के तहत जवाबदेही तय करने के लिए अस्पतालों को मरीजों के बिल पर दवा की खरीद लागत और MRP दोनों दर्शानी चाहिए।