वोटर लिस्ट में 16.18 लाख नाम जोड़ने का दावा गलत, यूपी CEO ने रिपोर्ट को सिरे से नकारा

उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची में करीब 16.18 लाख नए वोटरों के "रहस्यमयी" तरीके से जोड़े जाने की खबरों पर मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। एक मीडिया रिपोर्ट में लगाए गए इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए CEO ने स्पष्ट किया है कि पूरी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी रही है और इसमें किसी भी तरह की गड़बड़ी नहीं की गई है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक विस्तृत स्पष्टीकरण जारी करते हुए मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) की प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत ही पूरी की गई है। उन्होंने रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि ये दावे पूरी तरह से गलत धारणाओं पर आधारित हैं।
क्या है पूरा मामला और CEO का तर्क?
CEO ने स्पष्ट किया कि जिन 16.18 लाख फॉर्म-6 (नाम जोड़ने के लिए आवेदन) की बात की जा रही है, वे ड्राफ्ट रोल के प्रकाशन (6 जनवरी 2026) से पहले ही एकत्र कर लिए गए थे। यह काम बीएलओ (BLO) द्वारा घर-घर जाकर किए गए सर्वे के दौरान 27 अक्टूबर 2025 से 6 जनवरी 2026 के बीच किया गया था। यह चुनाव आयोग (ECI) के निर्देशों के अनुसार एक मानक प्रक्रिया थी, ताकि उन पात्र लोगों के नाम जोड़े जा सकें जिनके नाम पहले की सूची में नहीं थे।
नामों को छिपाने या प्रकाशित न करने के आरोपों पर जवाब देते हुए निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि नियमों के मुताबिक, केवल वही नाम 'दावों की सूची' (फॉर्म-9) में शामिल किए जाते हैं जो ड्राफ्ट रोल के प्रकाशन के बाद प्राप्त हुए हों। इन्हें CEO यूपी की वेबसाइट पर प्रदर्शित किया गया था, इसलिए कानून या नियमों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।
वहीं, फॉर्म-6 की स्वीकृति के प्रतिशत को लेकर उठाए गए सवालों को उन्होंने तर्कहीन बताया। उन्होंने कहा कि फॉर्म स्वीकार करने के लिए कोई तय प्रतिशत या फॉर्मूला नहीं होता, बल्कि हर आवेदन की जांच निर्धारित नियमों के तहत की जाती है और उसके बाद ही उसे स्वीकार किया जाता है।
अंत में, चुनाव निकाय ने जोर देकर कहा कि यह पूरी कवायद राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी के साथ की गई थी। उन्होंने दावा किया कि अब तक किसी भी राजनीतिक दल या व्यक्ति ने इस प्रक्रिया के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई है।