शाहजहाँपुर: ऐतिहासिक भारत मिलाप में दिखा आधुनिकता का असर, परंपराओं की अनदेखी पर भड़के लोग
शाहजहाँपुर के ऐतिहासिक भारत मिलाप कार्यक्रम में आधुनिक स्टेज और मैनेजमेंट के कारण परंपराओं के साथ खिलवाड़ का आरोप, श्रद्धालुओं ने जताया दुख।

उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में श्री रामलीला के दौरान आयोजित होने वाला ऐतिहासिक शाहजहाँपुर भारत मिलाप इस बार चर्चा में है, लेकिन वजह इसकी भव्यता नहीं बल्कि बदलता स्वरूप है। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में इस बार आधुनिक स्टेज और ताम-झाम ने ऐसी जगह ले ली कि श्रद्धालुओं को वह पुराना भावनात्मक जुड़ाव महसूस नहीं हुआ, जिसके लिए यह आयोजन जाना जाता था।
गुरुवार सुबह 6 बजे से ही श्री राम जानकी मंदिर के पास भक्तों की भारी भीड़ जुटने लगी थी। सुबह करीब 8:30 बजे जब चारों भाइयों के मिलन का मुख्य दृश्य सामने आया, तो लोगों ने पाया कि इस बार सादगी की जगह माइक्रोफोन, लंबे संवादों और भारी-भरकम स्टेज मैनेजमेंट ने ले ली है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले भाइयों के गले मिलने के दृश्य में जो करुणा और भावनाएं दिखती थीं, वे अब स्क्रिप्टेड डायलॉग्स और शोर-शराबे के बीच कहीं खो गई हैं।
स्टेज मैनेजमेंट और नियमों की अनदेखी पर उठे सवाल
कार्यक्रम के दौरान केवल भावनात्मक कमी ही नहीं, बल्कि अनुशासन को लेकर भी काफी नाराजगी देखी गई। लोगों ने आरोप लगाया कि स्टेज पर दोनों तरफ रैंप बनाए गए थे और समिति के सदस्य सोफों पर बैठे नजर आए। हद तो तब हो गई जब कुछ लोग जूते पहनकर ही स्टेज पर टहलते दिखे, जिससे श्रद्धालुओं की आस्था को ठेस पहुंची। साथ ही, भजनों के दौरान माइक्रोफोन में आई तकनीकी खराबी ने माहौल को और अधिक प्रभावित किया, जबकि उद्घोषक लगातार लोगों को स्टेज से दूर रहने की अपील कर रहे थे।
परंपरा के अनुसार, भारत मिलाप के बाद देवी-देवताओं को राजतिलक और आरती के लिए मंदिर के भीतर ले जाया जाता है, लेकिन इस बार ये सभी रस्में सीधे स्टेज पर ही पूरी कर ली गईं। इस बदलाव से मंदिर समिति के कुछ सदस्य भी असंतुष्ट दिखे। हालांकि, प्रदेश के वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने दिव्य स्वरूपों का तिलक और आरती की, जिसके बाद 'राजगद्दी' का जुलूस भोलागंज के लिए रवाना हुआ।
इस आयोजन में प्रदीप मेहरोत्रा, विजय टंडन, पूर्व पंचायत अध्यक्ष अजय यादव, ब्लॉक प्रमुख श्रीदत्त शुक्ला और अरुण गुप्ता समेत कई स्थानीय अधिकारी और गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे। लेकिन आयोजन के बाद चर्चा इसी बात की रही कि क्या आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों और भावनाओं को पीछे छोड़ते जा रहे हैं।