सौरभ राजपूत मर्डर केस: 'ब्लू ड्रम' कांड के दोषियों ने मौत की सजा के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया

मेरठ के चर्चित 'ब्लू ड्रम' मर्डर केस में मौत की सजा पाने वाले मुस्कान और साहिल ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील की है। जानें पूरा मामला।

Sushant Singh24 October 20262 min read0 viewsउत्तर प्रदेश
सौरभ राजपूत मर्डर केस: 'ब्लू ड्रम' कांड के दोषियों ने मौत की सजा के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया

उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुए सनसनीखेज सौरभ राजपूत हत्याकांड में एक नया मोड़ आया है। इस मामले में मौत की सजा पाने वाले दोषियों, मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला ने अब इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया है। इस केस को 'ब्लू ड्रम केस' के नाम से जाना जाता है क्योंकि वारदात के बाद शव को ठिकाने लगाने के लिए एक नीले रंग के प्लास्टिक ड्रम का इस्तेमाल किया गया था। अब दोनों दोषियों ने अपनी सजा को चुनौती देते हुए इसे रद्द करने की मांग की है।

मेरठ की जिला अदालत ने 30 सितंबर 2026 को दोनों को दोषी ठहराया था और 14 अक्टूबर 2026 को इस हत्याकांड को 'दुर्लभ से दुर्लभतम' (rarest of rare) श्रेणी में रखते हुए उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने उन पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था और सबूत मिटाने के जुर्म में भी सजा दी थी। अब दोषियों ने संयुक्त याचिका दायर कर अपनी रिहाई और सजा को खत्म करने की अपील की है, जिस पर अगले हफ्ते हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच में सुनवाई होने की संभावना है।

क्या था पूरा मामला और दोषियों के तर्क?

यह खौफनाक वारदात मेरठ के ब्रह्मपुरी इलाके की है। आरोप है कि सौरभ राजपूत की हत्या करने के बाद उसकी लाश को एक नीले प्लास्टिक के ड्रम में डाला गया और पहचान छिपाने व शव को ठिकाने लगाने के लिए उसमें सीमेंट और कंक्रीट भर दिया गया था। इस बात का खुलासा होने के बाद पूरे प्रदेश में हड़कंप मच गया था। पुलिस जांच के बाद मुस्कान और साहिल को गिरफ्तार किया गया, जिन्हें भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1), 3(5) और सबूत मिटाने की धारा 238(a) के तहत सजा सुनाई गई थी।

हाई कोर्ट में दायर अपनी अपील में दोषियों के वकीलों ने कई तकनीकी सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि:

  • अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा है।
  • पूरा मामला केवल परिस्थितियों (circumstantial evidence) पर आधारित है, जिसका निचली अदालत ने सही मूल्यांकन नहीं किया।
  • गवाहों के बयानों में विरोधाभास है, खासकर हथियार, सीमेंट और ड्रम की खरीद को लेकर।
  • खरीद से जुड़े सीसीटीवी फुटेज और रसीदें पेश नहीं की गईं।
  • रिकवरी से जुड़े दस्तावेजों पर स्वतंत्र गवाहों के हस्ताक्षर नहीं हैं और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के लिए जरूरी सर्टिफिकेट भी उपलब्ध नहीं हैं।

दोषियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील शुक्ला और अन्य वकीलों ने यह अपील पेश की है। अब सबकी नजरें इलाहाबाद हाई कोर्ट पर टिकी हैं कि वह निचली अदालत के इस कड़े फैसले पर क्या रुख अपनाता है।

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