CEC के इस्तीफे की मांग को लेकर यूपी में समाजवादी पार्टी का जोरदार प्रदर्शन

उत्तर प्रदेश में राजनीतिक माहौल एक बार फिर गर्मा गया है। समाजवादी पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और भारत निर्वाचन आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पार्टी ने वोटर लिस्ट के विशेष गहन संशोधन (SIR) में पक्षपात और अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए पूरे प्रदेश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया है।
इस पूरे आंदोलन का समापन 8 अक्टूबर को लखनऊ में जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय पर एक विशाल प्रदर्शन के साथ हुआ। यह प्रदर्शन सपा के एक हफ्ते तक चले 'लोकतंत्र बचाओ सप्ताह, वोट बचाओ-देश बचाओ' अभियान का हिस्सा था, जो 2 अक्टूबर से शुरू हुआ था। लखनऊ में पार्टी की नेता मोनिका नाज़ खान और महानगर अध्यक्ष शब्बीर अब्बास के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने कलेक्ट्रेट तक मार्च निकाला और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की।
प्रदेशभर में गूंजी सपा की आवाज, कई शहरों में पुलिस से टकराव
यह विरोध प्रदर्शन केवल राजधानी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में देखा गया:
- आगरा: यहाँ सपा कार्यकर्ताओं ने सुभाष पार्क से कलेक्ट्रेट तक मार्च किया, जहाँ पुलिस के साथ उनकी तीखी झड़प हुई। खबर है कि राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन को नजरबंद किया गया था।
- संभल: स्थानीय विधायकों के समर्थन से कार्यकर्ताओं ने कलेक्ट्रेट गेट पर मुख्य चुनाव आयुक्त का पुतला फूंका।
- वाराणसी: यहाँ समाजवादी पार्टी और नेशनल इक्वल पार्टी ने संयुक्त रूप से प्रदर्शन किया और चुनाव आयुक्त का पुतला जलाया।
- कानपुर: सिटी अध्यक्ष फजल महमूद, विधायक अमिताभ वाजपेयी और हसन रूमी के नेतृत्व में एक बड़ा जत्था डीएम कार्यालय पहुँचा।
- सुल्तानपुर: यहाँ सपा के एक प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी से मुलाकात की और फॉर्म-7 के जरिए औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। पार्टी का आरोप है कि PDA (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) समुदाय के मतदाताओं के नाम अवैध रूप से वोटर लिस्ट से हटाए जा रहे हैं।
सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा ने निर्वाचन आयोग पर तीखा हमला करते हुए इसे "वोट चोर आयोग" करार दिया और आरोप लगाया कि आयोग भाजपा सरकार के हितों को साधने का काम कर रहा है।
दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने पक्षपात के सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। आयोग का कहना है कि वोटर लिस्ट संशोधन के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं और आंतरिक विचार-विमर्श एक मानक प्रक्रिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग पर आयोग ने स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से संवैधानिक है। संविधान के अनुसार, CEC को केवल उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है, जिसके लिए लोकसभा के 100 या राज्यसभा के 50 सदस्यों के समर्थन से प्रस्ताव लाना होता है और अंत में राष्ट्रपति के आदेश की आवश्यकता होती है।