JNU में गूंजी संगम नगरी की विरासत, प्रयाग उत्सव 2026 में जुटे 450 से ज्यादा लोग

दिल्ली के JNU में आयोजित प्रयाग उत्सव 2026 में 450 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया और प्रयागराज की सांस्कृतिक व शैक्षणिक विरासत को याद किया।

Shubham Singh26 October 20262 min read0 viewsउत्तर प्रदेश
JNU में गूंजी संगम नगरी की विरासत, प्रयाग उत्सव 2026 में जुटे 450 से ज्यादा लोग

देश की राजधानी दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) रविवार को एक अलग ही रंग में रंगा नजर आया। मौका था प्रयाग उत्सव 2026 का, जहां संगम नगरी प्रयागराज की सांस्कृतिक, शैक्षणिक और ऐतिहासिक विरासत का जश्न मनाया गया। 'प्रयाग-दिल्ली संगम 2026' के हिस्से के रूप में आयोजित इस कार्यक्रम में दिल्ली-एनसीआर के 450 से अधिक लोग शामिल हुए, जिनका प्रयागराज से कोई न कोई गहरा नाता है—चाहे वह जन्म का हो, पढ़ाई का हो या पेशेवर जुड़ाव का।

शंख इनिशिएटिव्स की इस अनूठी पहल ने उन लोगों को एक मंच दिया, जो अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ना चाहते थे। कार्यक्रम के दौरान प्रयागराज के बौद्धिक और सांस्कृतिक योगदान पर विस्तार से चर्चा हुई। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री नंद गोपाल गुप्ता 'नंदी' मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि प्रयागराज की मिट्टी में एक ऐसा अपनापन है, जो वहां के लोगों को दुनिया के किसी भी कोने में रहे, अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि गंगा और यमुना के साथ-साथ सरस्वती का आध्यात्मिक और बौद्धिक महत्व आज भी लोगों की यादों और मूल्यों में जीवित है।

सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और चर्चाओं ने बांधा समां

उत्सव की शुरुआत पूर्व कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह की मौजूदगी में हुई, जिन्होंने इस आयोजन को राष्ट्रीय राजधानी में प्रयागराज की पहचान को उभारने वाला एक महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि JNU जैसे संस्थान में इस तरह के कार्यक्रम युवाओं को अपनी विरासत पर गर्व करना सिखाते हैं। वहीं, ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज के प्रिंसिपल प्रोफेसर आनंद शंकर सिंह ने बताया कि प्रयागराज की विरासत केवल अतीत की बात नहीं है, बल्कि यह एक जीवित परंपरा है जो आज भी हमारे विचारों को प्रभावित करती है।

इस उत्सव में केवल भाषण ही नहीं, बल्कि कला का संगम भी देखने को मिला। कार्यक्रम की रौनक बढ़ाने के लिए कथक नृत्य, लोक संगीत और युवा कवियों की गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसके अलावा, दो विशेष पैनल चर्चाएं हुईं जिनमें शहर की साहित्यिक परंपराओं और ऐतिहासिक महत्व पर मंथन किया गया। इन चर्चाओं में डॉ. धनंजय चोपड़ा, प्रोफेसर मधु रानी शुक्ला और जितेंद्र मणि त्रिपाठी जैसे कई दिग्गजों ने अपने विचार साझा किए।

शंख इनिशिएटिव्स की संरक्षक डॉ. कृतिका अग्रवाल और लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मुरली मनोहर पाठक ने भी भारत की ज्ञान परंपरा और शैक्षणिक संवाद की महत्ता पर प्रकाश डाला। अंत में, वक्ताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों की सराहना की।

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