मौदहा की चांदी की मछली: शाही विरासत पर संकट, विलुप्ति की कगार पर सदियों पुरानी कला

हमीरपुर के मौदहा की मशहूर चांदी की मछली की कला खत्म होने की कगार पर है। जानें क्यों संकट में है यह शाही विरासत।

Sushant Singh31 October 20262 min read0 viewsउत्तर प्रदेश
मौदहा की चांदी की मछली: शाही विरासत पर संकट, विलुप्ति की कगार पर सदियों पुरानी कला

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के मौदहा की मौदहा की चांदी की मछली अपनी बेमिसाल कारीगरी के लिए दुनिया भर में मशहूर है। दीपावली और धनतेरस जैसे त्योहारों के करीब आते ही इसकी मांग एक बार फिर बढ़ गई है, लेकिन इस चमक के पीछे एक कड़वा सच छिपा है। सदियों पुरानी यह अनूठी कला अब धीरे-धीरे दम तोड़ रही है और अगर जल्द ही इसे सरकारी संरक्षण नहीं मिला, तो आने वाली पीढ़ियां इसे सिर्फ किताबों में ही देख पाएंगी।

इस कला की विरासत को सहेजने का जिम्मा फिलहाल केवल सोनी परिवार के कंधों पर है, जो पिछले सात पीढ़ियों से इस बारीक काम को जीवित रखे हुए हैं। वर्तमान में राजेश सोनी और राजेंद्र सोनी दिन-रात मेहनत कर त्योहारों के लिए इन कलाकृतियों को तैयार कर रहे हैं। चांदी की इन मछलियों का वजन 5 ग्राम से लेकर 5 किलोग्राम तक होता है, और इनकी सबसे बड़ी खासियत इनका बिल्कुल असली मछली जैसा दिखना और बारीक नक्काशी है।

मुगल काल से महारानी विक्टोरिया तक का सफर

इस शिल्प का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। इसका जिक्र अबुल फजल द्वारा लिखे गए मुगलकालीन दस्तावेज़ 'आईन-ए-अकबरी' में भी मिलता है। इतना ही नहीं, ब्रिटिश शासन के दौरान सोनी परिवार के पूर्वजों ने एक चांदी की मछली महारानी विक्टोरिया को भेंट की थी, जिसे देखकर वह इसकी अद्भुत कारीगरी से बेहद प्रभावित हुई थीं।

इतने शानदार इतिहास के बावजूद, आज यह कला उपेक्षा का शिकार है। स्थानीय इतिहासकार राम मनोहर सोनी ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने इस शिल्प को औपचारिक सुरक्षा प्रदान नहीं की, तो यह परंपरा अगले कुछ वर्षों में पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।

कारीगरों का कहना है कि चांदी की बढ़ती कीमतें और बाजार में घटती मांग ने उनकी कमर तोड़ दी है। सबसे बड़ा दुख यह है कि इस विशिष्ट कला को अभी तक 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' (ODOP) योजना में शामिल नहीं किया गया है और न ही इसे जीआई (GI) टैग मिला है। सरकारी प्रोत्साहन के अभाव में नए कारीगर इस पेशे से दूर हो रहे हैं, जिससे यह शाही विरासत अब केवल चंद हाथों तक सिमट कर रह गई है। अब कारीगरों की उम्मीद सिर्फ सरकार से है कि वह इस मरती हुई कला को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए।

Share:

Comments

Leave a comment