मथुरा: विजयदशमी पर रावण के पुतले जलाने का विरोध, सारस्वत ब्राह्मणों ने की आरती

Sushant Singh20 October 20262 min read0 viewsउत्तर प्रदेश
मथुरा: विजयदशमी पर रावण के पुतले जलाने का विरोध, सारस्वत ब्राह्मणों ने की आरती

उत्तर प्रदेश के मथुरा में इस बार विजयदशमी का नजारा कुछ अलग रहा। जहां पूरी दुनिया में बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में रावण के पुतले जलाए जा रहे थे, वहीं मथुरा के सारस्वत ब्राह्मण समुदाय ने इसके उलट रास्ता चुना। समुदाय के लोगों ने रावण के पुतले जलाने का विरोध किया और पूरी श्रद्धा के साथ उनकी आरती उतारी और विशेष पूजा-अर्चना की।

लंकेश भक्त मंडल के संरक्षक ओमवीर सारस्वत ने इस परंपरा के पीछे की वजह बताते हुए कहा कि रावण सारस्वत ब्राह्मण समुदाय से थे और वे एक अत्यंत उच्च कोटि के विद्वान थे। उन्होंने पुतला दहन की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि एक महान विद्वान का पुतला जलाना उचित नहीं है।

राम और रावण के बीच के अनसुने प्रसंग का जिक्र

इस दौरान ओमवीर सारस्वत ने एक पौराणिक प्रसंग साझा किया, जिसमें उन्होंने बताया कि जब भगवान राम वनवास में थे और रामेश्वरम में भगवान शिव की स्थापना कर रहे थे, तब रावण ने उनके 'आचार्य' के रूप में सेवा की थी। उन्होंने बताया कि स्थापना के बाद जब भगवान राम ने दक्षिणा देने की इच्छा जताई, तो रावण ने विनम्रतापूर्वक कहा कि आप वनवास में हैं, क्या दे पाएंगे? लेकिन जब राम ने क्षत्रिय धर्म का हवाला देते हुए दक्षिणा देने पर जोर दिया, तो रावण ने एक अनोखा वरदान मांगा।

रावण ने कहा था कि जीवन और मृत्यु अनिश्चित है और शायद उनका अंत निकट है, इसलिए उनकी अंतिम इच्छा यह है कि जब उनकी मृत्यु का समय आए, तो उनके दोनों यजमान—भगवान राम और लक्ष्मण—उनके सामने मौजूद रहें। ओमवीर सारस्वत के अनुसार, विभिन्न वृत्तांतों में दर्ज है कि जब रावण के अंतिम क्षण आए, तब राम और लक्ष्मण दोनों उनके पास मौजूद थे।

हालांकि, आमतौर पर विजयदशमी का पर्व रावण वध के जरिए अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश देता है और लोग नकारात्मकता को दूर करने के लिए पुतले जलाते हैं, लेकिन मथुरा के इस समुदाय ने रावण के ज्ञान और उनकी विद्वत्ता को सम्मान देने का निर्णय लिया।

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