चांदी की कीमतों में उछाल: खतरे में लखनऊ की सदियों पुरानी 'नगरा' परंपरा

नवाबों के शहर लखनऊ की एक बेहद खास और सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान, जिसे 'नगरा' (शादी के पारंपरिक जूते) कहा जाता है, अब अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। वैश्विक बाजार में चांदी की कीमतों में आई भारी तेजी ने इन हस्तशिल्प जूतों को आम लोगों की पहुंच से बाहर कर दिया है। कभी नवाबी पहनावे का अहम हिस्सा और स्थानीय विरासत का प्रतीक रहे ये नगरे अब केवल अमीरों की तिजोरियों तक सिमटते जा रहे हैं।
कीमतों में आए इस बदलाव का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुछ साल पहले तक चांदी के नगरे एक जोड़ी 12,000 से 20,000 रुपये के बीच मिल जाते थे, लेकिन अब इनकी कीमत 60,000 से 75,000 रुपये तक पहुंच गई है। हाल ही में शादी करने वाली अरूसा सिद्दीकी ने बताया कि उन्हें एक जोड़ी नगरे के लिए 65,000 रुपये खर्च करने पड़े, जिसकी वजह से उन्हें शादी के अन्य खर्चों में कटौती करनी पड़ी। स्थानीय निवासी सना जहां ने दुख जताते हुए कहा कि आर्थिक तंगी के कारण उन्हें अपने चांदी के नगरे बेचने पड़े, जो इस परंपरा के ढलते स्वरूप को दर्शाता है।
वैश्विक अस्थिरता और आयात शुल्क ने बढ़ाई मुश्किल
वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अर्थशास्त्री डॉ. सलाहुद्दीन अय्यूब के अनुसार, रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान जैसे देशों में जारी संघर्षों के कारण दुनिया भर के निवेशक सुरक्षित संपत्तियों की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे चांदी की कीमतें बढ़ी हैं। अनुमान है कि चांदी की कीमत 2 लाख रुपये प्रति किलोग्राम से ऊपर बनी रहेगी। इसके अलावा, भारत की चांदी आयात पर निर्भरता और सरकार द्वारा विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने के लिए लगाए गए टैरिफ और लाइसेंसिंग नियमों ने घरेलू कीमतों को वैश्विक दरों से 20% अधिक कर दिया है।
इस महंगाई का सबसे बुरा असर लखनऊ के ऐतिहासिक चौक बाजार के कारीगरों पर पड़ा है। 30 साल का अनुभव रखने वाले 55 वर्षीय अज़हर हुसैन का दर्द यह है कि पिछले तीन महीनों में उन्होंने एक भी नगरा नहीं बेचा है। चौथी पीढ़ी के शिल्पकार जबबार हुसैन ने भी इस उद्योग के भविष्य को लेकर गहरी चिंता जताई है।
यह मामला अब राजनीतिक गलियारों तक भी पहुंच गया है। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद नीरज डांगी ने संसद में ग्रामीण परिवारों पर पड़ रहे इस आर्थिक बोझ का मुद्दा उठाया है। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेशी मुद्रा बचाने के लिए सोना न खरीदने की अपील के बाद लखनऊ महानगर सराफा एसोसिएशन और बुलियन व्यापारियों ने विरोध जताया है, क्योंकि उन्हें डर है कि इससे उनकी आजीविका पर सीधा असर पड़ेगा।
नवाब मोहम्मद अली शाह के वंशज नवाब मसूद अब्दुल्ला का कहना है कि ये जूते केवल फुटवियर नहीं हैं, बल्कि शहर के गौरवशाली इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं, जो अब गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है।