काशी की खास लक्ष्मी-गणेश मूर्तियों को मिलेगा GI टैग, सुनवाई पूरी

वाराणसी की गंगा मिट्टी से बनी खास लक्ष्मी-गणेश मूर्तियों के लिए GI टैग की प्रक्रिया पूरी हुई। अब इन मूर्तियों को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलेगी।

Sushant Singh6 November 20262 min read0 viewsउत्तर प्रदेश
काशी की खास लक्ष्मी-गणेश मूर्तियों को मिलेगा GI टैग, सुनवाई पूरी

वाराणसी की गलियों और घाटों की पहचान, गंगा की पवित्र मिट्टी से बनी लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों के लिए एक बड़ी खुशखबरी आई है। इन मूर्तियों को जल्द ही प्रतिष्ठित भौगोलिक संकेत (GI) टैग मिलने जा रहा है। बनारस क्ले क्राफ्ट के आवेदन पर औपचारिक सुनवाई पूरी हो चुकी है और अब अंतिम पंजीकरण का इंतजार है। यह कदम न केवल काशी की इस प्राचीन कला को संरक्षित करेगा, बल्कि यहां के स्थानीय शिल्पकारों को एक नई वैश्विक पहचान भी दिलाएगा।

पद्म श्री से सम्मानित और 'जीआई मैन ऑफ इंडिया' के नाम से मशहूर डॉ. रजनीकांत ने बताया कि ये मूर्तियां केवल मिट्टी के खिलौने नहीं, बल्कि आस्था और बनारसी शिल्प कौशल का संगम हैं। दिवाली के दौरान घरों और दुकानों में समृद्धि और शांति के लिए इन मूर्तियों की स्थापना की परंपरा रही है। इन मूर्तियों की सबसे बड़ी खासियत इनके अलंकृत मुकुट, हाथों से की गई बारीक़ पेंटिंग और पारंपरिक रंगों का खूबसूरत इस्तेमाल है, जो इन्हें आम मिट्टी की मूर्तियों से बिल्कुल अलग बनाता है।

परंपरा और इतिहास का अनूठा संगम

काशी की इस कला का संबंध केवल उत्तर प्रदेश से नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के मराठा समुदाय से भी गहरा है। पेशवा परिवार द्वारा काशी में की जाने वाली गणेश पूजा और 1898 से ब्रह्मघाट पर सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा, काशी और महाराष्ट्र के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक जुड़ाव को दर्शाती है।

इन मूर्तियों को बनाने की प्रक्रिया बेहद मेहनत भरी होती है। लक्ष्मीकुंड और आसपास के इलाकों में रहने वाले प्रजापति कुम्हार परिवारों की कई पीढ़ियां इस विरासत को संजोए हुए हैं। वे गंगा की गाद (सिल्ट) से मूर्तियां आकार देते हैं, उन्हें पारंपरिक भट्ठों में पकाते हैं और फिर हाथ से रंगों की सजावट करते हैं। अंत में, एक खास तरह का सजावटी मुकुट लगाया जाता है, जिससे ये 'स्टिक-ऑन' मूर्तियां तैयार होती हैं।

दिवाली के समय इन मूर्तियों की मांग इतनी बढ़ जाती है कि ये वाराणसी के घाटों से निकलकर पूरे भारत और विदेशों में बसे भारतीयों के घरों तक पहुंचती हैं। जीआई टैग मिलने के बाद, इन कलाकारों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी, जिससे उनके रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इनकी मांग और कीमत में इजाफा होगा।

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