कानपुर: बीजेपी रैली के जाम में फंसी एम्बुलेंस, समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सका घायल सिपाही, मौत

कानपुर में बीजेपी रैली के कारण लगे भीषण जाम में फंसी एम्बुलेंस के कारण एक घायल सिपाही ने दम तोड़ दिया। दिल दहला देने वाली पूरी घटना पढ़ें।

Sushant Singh6 November 20262 min read0 viewsउत्तर प्रदेश
कानपुर: बीजेपी रैली के जाम में फंसी एम्बुलेंस, समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सका घायल सिपाही, मौत

उत्तर प्रदेश के कानपुर से एक बेहद दुखद घटना सामने आई है, जहां राजनीतिक रैलियों की वजह से लगने वाले ट्रैफिक जाम ने एक जवान की जान ले ली। बीजेपी की 'लोकतंत्र बचाओ' रैली के कारण शहर के टटमिल चौराहे पर लगा भीषण जाम एक घायल सिपाही के लिए काल बन गया। एम्बुलेंस में गंभीर रूप से घायल अवस्था में ले जाए जा रहे 22 वर्षीय कॉन्स्टेबल प्रांशु सचान की अस्पताल पहुंचने से पहले ही मौत हो गई।

प्रांशु सचान अंबेडकर नगर जिले की टांडा कोतवाली में तैनात थे और मूल रूप से घाटमपुर के मोतीपुर गांव के रहने वाले थे। घटना की शुरुआत तब हुई जब प्रांशु आधिकारिक ड्यूटी के सिलसिले में रसूलबाद और बिदनू में समन तामील कराने गए थे। वापसी में फतेहपुर के कल्याणपुर इलाके में बक्सर मोड़ के पास एक तेज रफ्तार डंपर ने उनकी मोटरसाइकिल को जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर इतनी भीषण थी कि प्रांशु गंभीर रूप से घायल हो गए, जबकि डंपर चालक मौके से फरार हो गया।

पिता की गुहार भी रही बेकार, जाम में फंसी रही सांसें

हादसे के बाद प्रांशु को तुरंत स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां से उनकी गंभीर हालत को देखते हुए उन्हें हैलेट अस्पताल रेफर कर दिया गया। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जैसे ही एम्बुलेंस टटमिल चौराहे पर पहुंची, वह बीजेपी की रैली की वजह से लगे भारी ट्रैफिक जाम में फंस गई। करीब डेढ़ से दो घंटे तक एम्बुलेंस एक ही जगह खड़ी रही।

इस दौरान प्रांशु के पिता प्रमोद सचान, जो एक किसान हैं, एम्बुलेंस के पास मौजूद पुलिसकर्मियों और भीड़ से गिड़गिड़ाते रहे। उन्होंने बार-बार चिल्लाकर कहा कि अंदर उनका बेटा घायल है और उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाना जरूरी है, लेकिन रास्ता नहीं खुला। अंततः, अस्पताल पहुंचने से पहले ही प्रांशु ने दम तोड़ दिया।

प्रांशु के परिवार में उनके पिता प्रमोद, माता विभा और बहन चांदनी हैं। गुरुवार को उनका पोस्टमार्टम कराया गया, जिसके बाद पुलिस विभाग द्वारा पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनके पैतृक गांव में अंतिम संस्कार किया गया। इस घटना ने एक बार फिर शहर में रैलियों के दौरान ट्रैफिक मैनेजमेंट और आपातकालीन सेवाओं की प्राथमिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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