मुजफ्फरनगर: फास्ट ट्रैक कोर्ट के जज रवि दिवाकर का तबादला, अब फैमिली कोर्ट संभालेंगे कमान

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जज रवि दिवाकर को मुजफ्फरनगर फास्ट ट्रैक कोर्ट से हटाकर फैमिली कोर्ट में तैनात किया है। जानें क्या है पूरा मामला।

Sushant Singh23 October 20262 min read0 viewsउत्तर प्रदेश
मुजफ्फरनगर: फास्ट ट्रैक कोर्ट के जज रवि दिवाकर का तबादला, अब फैमिली कोर्ट संभालेंगे कमान

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा प्रशासनिक फैसला लेते हुए मुजफ्फरनगर के फास्ट ट्रैक कोर्ट में तैनात एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज (ADJ) रवि दिवाकर का तबादला कर दिया है। अब उन्हें इसी जिले के फैमिली कोर्ट में एडिशनल प्रिंसिपल जज के तौर पर जिम्मेदारी सौंपी गई है। 23 अक्टूबर 2026 को जारी आधिकारिक नोटिफिकेशन के जरिए इस बदलाव की पुष्टि की गई है।

जज रवि दिवाकर अपनी सख्त कार्यशैली और त्वरित फैसलों के लिए जाने जाते हैं। मुजफ्फरनगर में अपने महज 11 महीने के कार्यकाल के दौरान उन्होंने 23 लोगों को मौत की सजा सुनाई थी। अगर उनके पूरे करियर की बात करें, तो बरेली जैसे अन्य जिलों में अपनी तैनाती के दौरान उन्होंने अब तक कुल 36 लोगों को फांसी की सजा सुनाई है। इससे पहले वाराणसी में तैनाती के दौरान ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के सर्वे के आदेश देने के बाद वे राष्ट्रीय चर्चा में आए थे, जिसके बाद उन्हें धमकियां मिलने की बात भी सामने आई थी।

तबादले से पहले विवाद और माफियाओं पर कड़ा रुख

मुजफ्फरनगर में उनका कार्यकाल प्रशासनिक खींचतान से भी घिरा रहा। 18 अगस्त 2026 को तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने उनकी अदालत से 97 गंभीर आपराधिक मामलों की फाइलें वापस ले ली थीं। दिलचस्प बात यह थी कि यह कदम उस अधिकारी की सेवानिवृत्ति से महज 13 दिन पहले उठाया गया था।

जज दिवाकर ने इन तबादलों को कानूनी रूप से गलत बताते हुए सीआरपीसी की धारा 409 के तहत चुनौती दी थी। उनका आरोप था कि मामलों को हटाने के पीछे का मकसद गैंगस्टरों और माफियाओं को फायदा पहुंचाना है। उन्होंने यहां तक कह दिया था कि वे दबाव में आकर 'डरपोक जज' बनने के बजाय इस्तीफा देना पसंद करेंगे। हालांकि, उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार की पुलिस एनकाउंटर, संपत्ति कुर्की और एनएसए (NSA) जैसी सख्त नीतियों की जमकर सराहना भी की थी।

अपने नए पद पर जाने से ठीक एक दिन पहले, 22 अक्टूबर 2026 को जज रवि दिवाकर ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। उन्होंने 51 साल पुराने जमीन विवाद के मामले में आर्य परिवार के पक्ष में निर्णय दिया, जिससे एक लंबे समय से लंबित कानूनी लड़ाई का अंत हुआ।

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