बाराबंकी: वन विभाग की नाक के नीचे कट रहे प्रतिबंधित पेड़, ग्रामीणों ने लगाया मिलीभगत का आरोप
बाराबंकी के सिरौली गौसपुर में बड़े पैमाने पर प्रतिबंधित पेड़ों की अवैध कटाई का मामला सामने आया है। ग्रामीणों ने वन विभाग की मिलीभगत का आरोप लगाया है।

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में पर्यावरण संरक्षण के दावों की पोल खुलती नजर आ रही है। जिले के सिरौली गौसपुर तहसील के बडोसराय थाना क्षेत्र में इन दिनों बाराबंकी में अवैध पेड़ कटाई का खेल धड़ल्ले से चल रहा है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि यह सब वन विभाग के अधिकारियों की शह पर हो रहा है, जिसके कारण प्रतिबंधित पेड़ों को बेरहमी से काटा जा रहा है।
ताजा मामला अड़रा गांव का है, जहां रातों-रात पांच आम और एक नीम के प्रतिबंधित पेड़ काट दिए गए। इतना ही नहीं, ग्राम पंचायत हजरतपुर में दो हरे आम के पेड़ और खुर्दमऊ गांव में करीब आधा दर्जन प्रतिबंधित पेड़ों को जमींदोज कर दिया गया। सिरौली गौसपुर ब्लॉक में भी बिना किसी अनुमति के तीन जामुन के पेड़ काटे गए। हद तो तब हो गई जब बडोसराय कस्बे में पीएचसी के पास स्थित एक विशाल महुआ के पेड़ को लकड़ी काटने वालों ने उखाड़ फेंका।
जेसीबी और पावर सॉ से हो रहा पेड़ों का सफाया
ग्रामीणों के मुताबिक, हाल ही में आए तूफान का फायदा उठाकर लकड़ी तस्कर और ठेकेदार सक्रिय हो गए हैं। वे जेसीबी मशीनों से पेड़ों को गिरा रहे हैं और पेट्रोल से चलने वाली आरी (पावर सॉ) का इस्तेमाल कर उन्हें तेजी से काटकर ले जा रहे हैं। सड़क किनारे लगे कई पेड़ों को भी निशाना बनाया गया है। करोरा गांव में तो ठेकेदारों ने परमिट होने का दावा किया, लेकिन जब ग्रामीणों ने दस्तावेज मांगे, तो वे उसे दिखाने में नाकाम रहे।
स्थानीय लोगों का कहना है कि रामनगर रेंज के अधिकारी इस पूरे खेल में शामिल हैं। जब भी उन्हें सूचना दी जाती है, तो वे अनजान बनने का नाटक करते हैं। एक तरफ योगी सरकार पर्यावरण बचाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर वन विभाग के कर्मचारी नियमों को ताक पर रखकर अपनी जेबें भर रहे हैं।
इस पूरे मामले पर रामनगर रेंज के डिप्टी रेंज ऑफिसर दीपक कुमार गौर ने जांच कर उचित कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है। वहीं, पर्यावरण संरक्षण समिति के अध्यक्ष ने इस गंभीर मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री को पत्र लिखने का फैसला किया है, ताकि लापरवाह अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो सके। अब देखना यह है कि प्रशासन इन 'पेड़ माफियाओं' पर नकेल कसता है या फिर जांच के नाम पर मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा।