गोरखपुर: डीजे की धमक से डॉक्टर के क्लिनिक में टूटा सामान, वाइब्रेशन से दवाइयां बिखरीं
गोरखपुर में डीजे के भारी वाइब्रेशन से एक डॉक्टर के क्लिनिक में दवाइयां और उपकरण टूट गए। जानें शोर प्रदूषण पर प्रशासन के सख्त नियम।

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां डीजे के शोर और उससे होने वाले भारी वाइब्रेशन ने एक डॉक्टर के क्लिनिक को नुकसान पहुंचाया है। यह घटना इतनी गंभीर थी कि डीजे की गूंज से क्लिनिक के भीतर रखी दवाइयों की बोतलें गिरकर चकनाचूर हो गईं और अन्य महत्वपूर्ण उपकरण अपनी जगह से खिसक गए।
पीड़ित डॉक्टर ने इस घटना के सबूत के तौर पर तस्वीरें साझा की हैं। उन्होंने बताया कि जब वह क्लिनिक बंद करके गए थे, तब सब कुछ सही सलामत और व्यवस्थित था। लेकिन अगली सुबह जब उन्होंने क्लिनिक खोला, तो अंदर का नजारा देखकर वह दंग रह गए। फर्श पर दवाइयां बिखरी पड़ी थीं और सामान अस्त-व्यस्त था। डॉक्टर का आरोप है कि उनके क्लिनिक के पास से गुजरे एक हाई-इंटेंसिटी डीजे सिस्टम की वजह से इतनी तेज कंपन हुई कि सामान गिर गया।
शोर प्रदूषण पर प्रशासन की सख्ती और कानूनी कार्रवाई
शहर में बढ़ते शोर प्रदूषण को देखते हुए गोरखपुर जिला प्रशासन और पुलिस पहले से ही सख्त रुख अपनाए हुए है। विशेषकर त्योहारों के सीजन से पहले डीजे संचालकों के लिए हलफनामा (Affidavit) देना अनिवार्य कर दिया गया है, जिसमें उन्हें ध्वनि स्तर को 75 डेसिबल से नीचे रखने का वादा करना होता है।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 15 के तहत निर्धारित डेसिबल सीमा का उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना और जेल दोनों का प्रावधान है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी इस संबंध में कड़े निर्देश दिए हैं, जिसके अनुसार अत्यधिक शोर मचाने पर पांच साल तक की कैद और एक लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। कोर्ट का मानना है कि शोर न केवल नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है, बल्कि यह बुजुर्गों, बच्चों और मरीजों के स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक है।
गोरखपुर पुलिस ने इस दिशा में 'जीरो टॉलरेंस' नीति अपनाई है। पुलिस द्वारा लाउडस्पीकरों की जांच के लिए विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ मानव जीवन को खतरे में डालने और ध्वनि प्रदूषण फैलाने की धाराओं में एफआईआर दर्ज की जा रही है। हाल ही में 15 अक्टूबर को भी इस मामले में गिरफ्तारियां की गई थीं।