"आज मुझे न्याय मिला, मैं बहुत खुश हूं": देवबंद कस्टोडियल गैंगरेप मामले में दो पूर्व पुलिसकर्मियों को 20 साल की सजा

सहारनपुर कोर्ट ने देवबंद कस्टोडियल गैंगरेप मामले में दो पूर्व पुलिसकर्मियों को 20 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई है। पढ़ें पूरी कहानी।

Sushant Singh6 November 20262 min read0 viewsउत्तर प्रदेश
"आज मुझे न्याय मिला, मैं बहुत खुश हूं": देवबंद कस्टोडियल गैंगरेप मामले में दो पूर्व पुलिसकर्मियों को 20 साल की सजा

सहारनपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट-II ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 2015 के देवबंद कस्टोडियल गैंगरेप मामले में दो पूर्व पुलिसकर्मियों को 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। दोषी ठहराए गए आरोपियों में तत्कालीन थाना प्रभारी (SHO) बृजमोहन यादव और उप-निरीक्षक (SI) वेगपाल सिंह शामिल हैं। अदालत ने दोनों दोषियों पर 1.2 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

11 साल के लंबे और कठिन कानूनी संघर्ष के बाद न्याय पाने वाली पीड़िता ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा, "आज मुझे न्याय मिला है और मैं बहुत खुश हूं। मैं अपनी खुशी शब्दों में बयान नहीं कर सकती। अगर इस देश में अदालतें न होतीं, तो कोई भी न्याय नहीं पा पाता। यह अदालत और मेरे वकील की मेहनत है कि मुझे इंसाफ मिला।"

रक्षकों ने ही बनाया शिकार: क्या था पूरा मामला?

यह दिल दहला देने वाली घटना 6 अगस्त 2015 की है। पीड़िता, जो देवबंद की रहने वाली है, अपने पति की गिरफ्तारी के सिलसिले में देवबंद थाने गई थी। आरोप है कि वहां तैनात चौकी प्रभारी पंकज धामा उसे एसएचओ के कमरे में ले गया। कमरे के अंदर तत्कालीन एसएचओ बृजमोहन यादव, सब-इंस्पेक्टर वेगपाल सिंह, पंकज धामा और एक कांस्टेबल मौजूद थे। इन चारों ने मिलकर महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया।

न्याय की यह राह आसान नहीं थी। पीड़िता के वकील राजीव तोमर के अनुसार, शुरुआत में स्थानीय पुलिस और एसएसपी ने शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद पीड़िता को इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा, जिसके हस्तक्षेप के बाद एफआईआर दर्ज हुई। मामला जब सीबीसीआईडी (CBCID) के पास गया, तो जांच एजेंसी ने आरोपियों को क्लीन चिट देते हुए क्लोजर रिपोर्ट लगा दी।

पीड़िता ने हार नहीं मानी और प्रोटेस्ट पिटीशन दायर की, जिसके बाद अदालत ने चारों आरोपियों को तलब किया। हालांकि, इस मामले में दो आरोपियों को कानूनी खामियों का फायदा मिला। पंकज धामा ने मानसिक बीमारी की फर्जी मेडिकल रिपोर्ट पेश कर दी, जिससे उसके खिलाफ ट्रायल नहीं चल सका। वहीं, एक अन्य कांस्टेबल को सीबीसीआईडी की लापरवाही भरी जांच के कारण खोजा ही नहीं जा सका।

इन 11 वर्षों के दौरान पीड़िता और उसके पति को लगातार धमकियां मिलीं। उन पर हमले किए गए और उन्हें प्रताड़ित करने के लिए कई झूठे मुकदमे भी दर्ज कराए गए। लेकिन तमाम दबावों के बावजूद पीड़िता डटी रही। गुरुवार को जब सजा की अवधि पर बहस हुई, तो बचाव पक्ष ने उम्र का हवाला देते हुए नरमी बरतने की अपील की, जिसे अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया और शुक्रवार को दोषियों को कड़ी सजा सुनाई।

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