कॉर्बेट लिटरेचर फेस्टिवल: बाघों की दहाड़ से लोक परंपराओं तक, जंगलों की कहानियों का संगम

KhabarCentral6 October 20262 min read0 views
कॉर्बेट लिटरेचर फेस्टिवल: बाघों की दहाड़ से लोक परंपराओं तक, जंगलों की कहानियों का संगम

उत्तराखंड के रामनगर में प्रकृति की गोद और घने जंगलों के बीच 'कॉर्बेट लिटरेचर फेस्टिवल' का शानदार आगाज हुआ है। यह तीन दिवसीय आयोजन केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वन्यजीवों, उनके संरक्षण और जंगलों के साथ जीने वाले समुदायों की अनकही कहानियों को दुनिया के सामने लाने का एक मंच बन गया है। मंगलवार से शुरू हुए इस उत्सव में लेखक, संरक्षणवादी, वैज्ञानिक, फोटोग्राफर और लोक कलाकार एक साथ जुटे हैं, ताकि जंगल और इंसान के बीच के गहरे रिश्ते को समझा जा सके।

फेस्टिवल के पहले दिन जिम कॉर्बेट के योगदान और वन्यजीव संरक्षण पर विशेष जोर दिया गया। साथ ही, जंगल की अग्रिम पंक्ति (frontline) पर काम करने वाले लोगों के अनुभवों और लोक संगीत ने माहौल को और भी जीवंत बना दिया। इस आयोजन को उत्तराखंड वन विभाग, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व और उत्तराखंड पर्यटन का पूरा समर्थन प्राप्त है।

संरक्षण और सामुदायिक कल्याण का तालमेल

उत्तराखंड के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने इस मौके पर एक बेहद जरूरी बात कही। उन्होंने जोर देकर कहा कि जंगलों और वन्यजीवों का संरक्षण तब तक अधूरा है, जब तक कि वहां रहने वाले स्थानीय समुदायों का कल्याण नहीं होता। उनके अनुसार, प्रकृति को बचाने की कोशिशें और स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में सुधार, दोनों को साथ लेकर चलना होगा। वहीं, मुख्य वन्यजीव वार्डन नीना ग्रेवाल ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह फेस्टिवल वन विभाग, उद्यमियों और स्थानीय लोगों को एक सूत्र में बांधने का काम करेगा, जो दुनिया के लिए एक मिसाल बनेगा।

कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने इस बात पर चर्चा की कि संरक्षण का मतलब सिर्फ बाघों को बचाना नहीं है, बल्कि पूरी जैव विविधता (biodiversity) को सुरक्षित रखना है। रीवाइल्डिंग विशेषज्ञ विजय धसमाना ने समझाया कि पारिस्थितिक पिरामिड के आधार—जैसे कीड़े-मकौड़ों, उभयचरों, घास और पेड़ों—को बचाना सबसे जरूरी है, क्योंकि इन्हीं के दम पर बड़े जीव जीवित रहते हैं।

फेस्टिवल में वन्यजीव रेस्क्यू की चुनौतियों पर भी बात हुई। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के सीनियर वाइल्डलाइफ वेटरनरी ऑफिसर डॉ. द्युशांत शर्मा ने बताया कि हर बाघ का व्यवहार अलग होता है, इसलिए रेस्क्यू के दौरान कोई एक तय नियम काम नहीं आता। उन्होंने मानव-पशु संघर्ष के दौरान स्थानीय लोगों के बदलते मिजाज और वन कर्मियों द्वारा झेले जाने वाले जोखिमों पर भी रोशनी डाली। यह उत्सव 8 अक्टूबर को विभिन्न सत्रों, फोटो प्रदर्शनियों और नेचर वॉक के साथ संपन्न होगा।

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