अयोध्या दीपोत्सव: 33 लाख दीयों और सूर्य के दिन का अद्भुत संयोग, जगद्गुरु ने बताया महत्व

जगद्गुरु स्वामी सतीशचार्य ने बताया क्यों इस बार का अयोध्या दीपोत्सव खास है और 33 लाख दीयों का क्या है आध्यात्मिक संबंध।

Shubham Singh6 November 20262 min read0 viewsउत्तर प्रदेश
अयोध्या दीपोत्सव: 33 लाख दीयों और सूर्य के दिन का अद्भुत संयोग, जगद्गुरु ने बताया महत्व

सूर्यवंशी भगवान राम की नगरी अयोध्या एक बार फिर रोशनी से नहाने को तैयार है। इस साल का अयोध्या दीपोत्सव 2024 न केवल भव्य होगा, बल्कि इसका ज्योतिषीय और आध्यात्मिक महत्व भी बेहद खास है। कानपुर के प्रेमेश्वर धाम के प्रमुख और महर्षि महेश योगी परंपरा के ध्वजवाहक जगद्गुरु स्वामी सतीशचार्य जी महाराज ने इस आयोजन को दैवीय संकेत बताया है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरयू के तट पर इस बार 10वें दीपोत्सव के अवसर पर 33 लाख मिट्टी के दीये जलाए जाएंगे। जगद्गुरु सतीशचार्य ने इस संख्या के पीछे के गहरे अर्थ को समझाते हुए कहा कि सनातन परंपरा में 33 कोटि (प्रकार) के देवताओं का वर्णन है, जिनमें 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्विनी कुमार शामिल हैं। खास बात यह है कि 12 आदित्य स्वयं सूर्य के ही रूप हैं।

सूर्य के दिन और 33 लाख दीयों का दिव्य संयोग

स्वामी सतीशचार्य के अनुसार, सूर्यवंशी भगवान राम की नगरी में जब दिवाली रविवार (सूर्य के दिन) को पड़ रही है, तब 33 कोटि देवताओं के प्रतीक स्वरूप 33 लाख दीयों का प्रज्वलित होना कोई संयोग नहीं, बल्कि एक दैवीय संकेत है। उन्होंने कहा कि जिस तरह त्रेता युग में प्रभु राम की वापसी पर अयोध्या दीपों से जगमगा उठी थी, आज योगी जी के प्रयासों से वही अयोध्या पूरी दुनिया के लिए प्रकाश का संदेशवाहक बन गई है।

जगद्गुरु ने एक और दिलचस्प पहलू साझा करते हुए कहा कि भगवान राम ने दस सिर वाले रावण का संहार किया था। ठीक उसी तरह, दस साल पहले अयोध्या में जो दीप जलाया गया था, उसकी रोशनी अब दसों दिशाओं में फैल चुकी है। हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि इस उत्सव की असली सफलता तब होगी जब राम के आदर्शों का दीपक हर भारतीय के हृदय में प्रज्वलित होगा।

महर्षि परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने देश-विदेश के श्रद्धालुओं से एक विशेष अपील की है। उन्होंने कहा कि जब अयोध्या में दीप प्रज्वलन समारोह हो, तब हर भक्त एक दीपक जलाए और एक मिनट के लिए भगवान राम का ध्यान करे। उनके शब्दों में, "बाहरी दीपक तभी सार्थक होता है जब भीतर ध्यान का दीपक जलता है।"

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