यूपी में पंचायत चुनाव 3 महीने में कराने का हाई कोर्ट का आदेश

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का इंतजार कर रहे लोगों के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट से एक बड़ा फैसला आया है। कोर्ट ने राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग को सख्त निर्देश दिए हैं कि पूरे प्रदेश में पंचायत चुनाव की प्रक्रिया को अगले तीन महीनों के भीतर पूरा किया जाए। जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने करीब तीन घंटे तक चली लंबी सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया।
यह आदेश कुल 11 याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया, जिनमें छह जनहित याचिकाएं (PIL) शामिल थीं। इन याचिकाओं में चुनावों में हो रही देरी और प्रशासकों की नियुक्ति को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने सरकार के उस फैसले को सही ठहराया जिसमें कार्यकाल खत्म होने के बाद पुराने ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किया गया था। अब ये प्रशासक केवल अगले तीन महीनों तक ही अपने पद पर बने रहेंगे, जिसके बाद नए चुनाव होंगे।
आरक्षण और राजनीतिक प्रतिक्रिया
चुनावों में आरक्षण के मुद्दे पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया मौजूदा ढांचे के तहत ही चलेगी, जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27% आरक्षण शामिल है। अदालत ने यह भी कहा कि ओबीसी आयोग का काम चलने की वजह से चुनाव की समयसीमा में कोई देरी नहीं होनी चाहिए।
इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती आराधना मिश्रा मोना ने कोर्ट के इस कदम का स्वागत किया है और इसे लोकतंत्र की जीत बताया है। उन्होंने सरकार पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया कि आखिर प्रशासन समय पर चुनाव कराने से क्यों डर रहा था। मोना का आरोप है कि भाजपा सरकार बेरोजगारी, महंगाई और पेपर लीक जैसे ग्रामीण मुद्दों के कारण 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले अपनी छवि खराब होने के डर से इन चुनावों को टाल रही थी।
अब गेंद उत्तर प्रदेश सरकार के पाले में है। सरकार को तय करना होगा कि वह कोर्ट के आदेश के मुताबिक तीन महीने में चुनाव कराएगी या फिर इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी।