UP में विवाहित बेटी को भी मिलेगी राशन दुकान, लखनऊ हाईकोर्ट ने शादी के आधार पर आवेदन खारिज करने को बताया गलत
UP: लखनऊ हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि मृतक राशन दुकान संचालक की शादीशुदा बेटी को केवल विवाहित होने के कारण राशन दुकान मिलने से नहीं रोका जा सकता। कोर्ट ने साफ किया कि शादीशुदा होने के आधार पर किसी पात्र
UP: लखनऊ हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि मृतक राशन दुकान संचालक की शादीशुदा बेटी को केवल विवाहित होने के कारण राशन दुकान मिलने से नहीं रोका जा सकता। कोर्ट ने साफ किया कि शादीशुदा होने के आधार पर किसी पात्र बेटी का आवेदन खारिज करना मनमाना और गलत है। यह फैसला उन परिवारों के लिए बड़ी राहत है जो अनुकंपा आधार पर दुकान के आवंटन की उम्मीद कर रहे थे।
मामला प्रतापगढ़ के रानीगंज का है, जहां एसडीएम ने जनवरी 2026 में एक याचिकाकर्ता का आवेदन यह कहकर खारिज कर दिया था कि वह विवाहित बेटी है और नियमों के मुताबिक ‘परिवार’ की परिभाषा में नहीं आती। इस आदेश के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल के सामने याचिका दायर की गई थी। कोर्ट ने एसडीएम के इस फैसले को रद्द करते हुए कहा कि केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर किसी को अधिकार से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश आवश्यक वस्तु आदेश, 2016 के क्लॉज 2(p) का हवाला दिया। इस नियम के अनुसार ‘परिवार’ की परिभाषा में उन वयस्क बच्चों को शामिल किया गया है जो परिवार के मुखिया पर पूरी तरह आश्रित हों। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस परिभाषा में बेटे और बेटियां दोनों आते हैं, चाहे उनकी शादी हुई हो या नहीं।
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के जून 2026 के कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले के फैसले पर आधारित है। सुप्रीम कोर्ट ने 2 जून, 2026 को कहा था कि विवाहित बेटियों को अनुकंपा लाभ या राशन दुकान के आवंटन से बाहर रखना असंवैधानिक है और यह लैंगिक भेदभाव है। अदालत ने यह भी माना कि शादी करने से बेटी और उसके मायके के बीच का रिश्ता खत्म नहीं होता और न ही यह माना जा सकता है कि वह अब अपने परिवार पर निर्भर नहीं है।