Delhi: देश के सख्त आतंकवाद विरोधी कानून UAPA के तहत जमानत देने के नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में खींचतान चल रही है। दिल्ली पुलिस ने कोर्ट को बताया है कि अलग-अलग जजों की बेंच ने इस कानून पर अलग-अलग फैसले दिए हैं, जिससे
Delhi: देश के सख्त आतंकवाद विरोधी कानून UAPA के तहत जमानत देने के नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में खींचतान चल रही है। दिल्ली पुलिस ने कोर्ट को बताया है कि अलग-अलग जजों की बेंच ने इस कानून पर अलग-अलग फैसले दिए हैं, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। अब पुलिस की मांग है कि इस कानूनी उलझन को सुलझाने के लिए एक बड़ी बेंच से राय ली जानी चाहिए।
क्यों हो रहा है UAPA जमानत पर विवाद
दरअसल, 18 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने सैयद इफ्तिखार अंदाबी नाम के व्यक्ति को जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि UAPA जैसे सख्त कानून में भी जमानत एक नियम होना चाहिए। वहीं, इससे पहले जनवरी 2026 में दूसरी बेंच ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने तब कहा था कि जेल में लंबे समय तक रहना जमानत पाने का सीधा अधिकार नहीं है। इसी विरोधाभास की वजह से दिल्ली पुलिस ने अब बड़ी बेंच की जरूरत बताई है।
कौन से मामले हैं और क्या है कानूनी पेंच
यह पूरा मामला तस्लीम अहमद और खालिद सैफी की जमानत याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया। ये दोनों 2020 के दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश के आरोपी हैं। दिल्ली पुलिस की तरफ से ASG एस.वी. राजू ने कोर्ट से कहा कि जब दो अलग-अलग बेंचों के फैसले एक-दूसरे से अलग हों, तो स्पष्टता के लिए बड़े बेंच का फैसला जरूरी होता है। फिलहाल कोर्ट इस मामले में एक पुराने फैसले का अध्ययन कर रहा है।
NCRB के आंकड़े और जमानत की शर्तें
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई के दौरान NCRB के डेटा का भी जिक्र किया। आंकड़ों के मुताबिक, 2019 से 2023 के बीच UAPA के मामलों में सजा की दर बहुत कम यानी सिर्फ 1.5% से 4% रही है। इसका मतलब है कि करीब 94% से 98% मामलों में आरोपी बरी हो जाते हैं। कानून की धारा 43D(5) कहती है कि अगर आरोप पहली नजर में सही लगते हैं, तो जमानत नहीं दी जानी चाहिए, लेकिन आर्टिकल 21 के तहत व्यक्तिगत आजादी भी एक बड़ा अधिकार है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
UAPA में जमानत मिलना मुश्किल क्यों है?
UAPA की धारा 43D(5) के तहत अगर कोर्ट को लगता है कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप पहली नजर में सही हैं, तो जमानत नहीं दी जाती है। हालांकि, अब कोर्ट लंबे समय तक जेल में रहने (prolonged incarceration) को भी आधार बना रहा है।
NCRB के आंकड़े क्या बताते हैं?
NCRB के डेटा के अनुसार, 2019 से 2023 के बीच UAPA मामलों में सजा दर केवल 1.5% से 4% रही है, जिसका अर्थ है कि अधिकतर आरोपी अंत में बरी हो जाते हैं।