Thane में बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट से बढ़ी बाढ़ की समस्या, शिव सेना पार्षदों ने लगाया जल निकासी रोकने का आरोप

Maharashtra/Thane: ठाणे के म्हाटारडी और बेटवाडे गांवों के बीच चल रहे बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। शिव सेना के पार्षदों ने आरोप लगाया है कि निर्माण कार्य की वजह से प्राकृतिक जल निकासी के रास्ते बंद

Maharashtra/Thane: ठाणे के म्हाटारडी और बेटवाडे गांवों के बीच चल रहे बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। शिव सेना के पार्षदों ने आरोप लगाया है कि निर्माण कार्य की वजह से प्राकृतिक जल निकासी के रास्ते बंद हो गए हैं, जिससे इलाके में बाढ़ की स्थिति और खराब हो गई है। इसका सीधा असर स्थानीय किसानों की रोजी-रोटी पर पड़ रहा है।

22 जुलाई 2026 को ठाणे नगर निगम (TMC) की आम बैठक में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया गया। पूर्व डिप्टी मेयर रमाकांत माधवी और पार्षद आदेश भगत ने कहा कि बुलेट ट्रेन कॉरिडोर के लिए बनाए गए तटबंधों और बुनियादी ढांचे ने बारिश के पानी के प्राकृतिक रास्तों को रोक दिया है। उन्होंने यह भी बताया कि प्रोजेक्ट के लिए की गई लैंड-फिलिंग आसपास की बस्तियों से ज्यादा ऊंची है, जिसकी वजह से भारी बारिश के दौरान पानी बस्तियों में घुस रहा है और इस साल जलजमाव पहले से कहीं ज्यादा हुआ है।

इस गंभीर मुद्दे पर नगर निगम की आम सभा ने हस्तक्षेप की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पास किया। इसके बाद बुधवार को TMC अधिकारियों और स्थानीय प्रतिनिधियों ने म्हाटारडी और बेटवाडे के प्रभावित इलाकों का मौका-मुआयना किया।

दूसरी तरफ, नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है। NHSRCL के प्रवक्ता ने कहा कि मानसून शुरू होने से पहले ही TMC के साथ मिलकर संयुक्त निरीक्षण किया गया था और जरूरी सुधार लागू कर दिए गए थे। एजेंसी का दावा है कि भारी बारिश के दौरान होने वाला अस्थायी जलजमाव पाइपों और पुलियों के नेटवर्क के जरिए बारिश रुकते ही निकल जाता है।

इसी बीच, जुलाई के मध्य में उल्लास नदी पर बने बुलेट ट्रेन पुल के बहने की खबरों पर भी NHSRCL ने सफाई दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई स्थायी पुल नहीं बहा है, बल्कि निर्माण सामग्री ले जाने वाला एक अस्थायी रास्ता बारिश की वजह से प्रभावित हुआ था। इससे स्थायी पुल की मजबूती या डिजाइन पर कोई असर नहीं पड़ा है।

नियमों की बात करें तो UDCPR 2034 के मुताबिक प्राकृतिक नालों के ऊपर या अंदर किसी भी निर्माण की अनुमति नहीं है और नालों के किनारे 3 से 6 मीटर का बफर जोन रखना जरूरी होता है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भी पहले कहा है कि नालों को कंक्रीट स्लैब से ढकने से पानी का बहाव कम होता है और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।