पटना HC के ‘छाती दबाना रेप की कोशिश नहीं’ वाले आदेश पर Supreme Court सख्त, देशभर के लिए जारी किए नए गाइडलाइंस
Bihar: पटना हाईकोर्ट के एक विवादित फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। मामला एक महिला के साथ हुई छेड़छाड़ से जुड़ा था, जिसमें हाईकोर्ट ने कहा था कि छाती दबाना रेप की कोशिश नहीं है। इस पर अब देश की सबसे बड़ी अ
Bihar: पटना हाईकोर्ट के एक विवादित फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। मामला एक महिला के साथ हुई छेड़छाड़ से जुड़ा था, जिसमें हाईकोर्ट ने कहा था कि छाती दबाना रेप की कोशिश नहीं है। इस पर अब देश की सबसे बड़ी अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए जजों की रिसर्च पर सवाल उठाए हैं और यौन अपराधों के मामलों में संवेदनशीलता बरतने के लिए नए निर्देश जारी किए हैं।
पूरा मामला साल 2008 का है, जो बिहार के बांका जिले से जुड़ा था। 9 जुलाई 2026 को पटना हाईकोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने एक आरोपी को बरी करते हुए कहा कि महिला के कपड़े उतारने की कोशिश करना या उसकी छाती दबाना रेप की कोशिश (Section 376/511 IPC) नहीं है। कोर्ट ने इसे केवल महिला की मर्यादा को ठेस पहुँचाने (Section 354 IPC) का मामला माना क्योंकि इसमें पेनिट्रेशन का सबूत नहीं था।
इस फैसले को सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता और एच.एस. फूलका ने सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा। उन्होंने बताया कि इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक ऐसे ही फैसले को सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है, फिर भी इस तरह के फैसले आ रहे हैं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और उनकी बेंच ने इस पर गहरी नाराजगी जताई। CJI ने कहा कि जज फैसला सुनाने से पहले जरूरी रिसर्च नहीं कर रहे हैं और उन्हें पुराने फैसलों का अध्ययन करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने अब नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA) की एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट को मंजूरी दे दी है। इसके तहत देशभर की अदालतों के लिए यौन अपराधों के मामलों में संवेदनशीलता और सहानुभूति दिखाने के लिए नए गाइडलाइंस जारी किए गए हैं। कोर्ट ने आदेश दिया है कि सभी राज्यों के DGP और प्रोसिक्यूशन डायरेक्टर यह सुनिश्चित करें कि पुलिस स्टेशन FIR दर्ज करते समय और चार्जशीट फाइल करते समय इन नियमों का पालन करें।
इन गाइडलाइंस को सुप्रीम कोर्ट, सभी हाईकोर्ट, जिला अदालतों और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा। साथ ही, पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस को एक एक्सपर्ट कमेटी बनाने की जिम्मेदारी दी गई है, जो जजों को संवेदनशील मामलों में और अधिक सहानुभूतिपूर्ण बनाने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करेगी।