Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने एक ट्रांसवुमन टीचर Jane Kaushik को नौकरी पाने की लड़ाई में बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के एक पुराने आदेश को फिर से लागू कर दिया है, जिससे अब Jane Kaushik अपनी पसंद की किसी भी वैकेंस
Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने एक ट्रांसवुमन टीचर Jane Kaushik को नौकरी पाने की लड़ाई में बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के एक पुराने आदेश को फिर से लागू कर दिया है, जिससे अब Jane Kaushik अपनी पसंद की किसी भी वैकेंसी के लिए आवेदन कर सकेंगी। खास बात यह है कि उन्हें वैकेंसी में लिखे जेंडर (पुरुष या महिला) की चिंता नहीं करनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया और क्यों पड़ी जरूरत
जस्टिस J.B. Pardiwala और जस्टिस K.V. Viswanathan की बेंच ने इस मामले में दखल दिया। Jane Kaushik ने DSSSB के ऑनलाइन पोर्टल (OARS) पर खुद को ‘ट्रांसजेंडर’ के रूप में रजिस्टर किया था, लेकिन वह अप्लाई नहीं कर पा रही थीं क्योंकि वहां सिर्फ पुरुष या महिला का विकल्प था। कोर्ट ने अंतरिम राहत देते हुए जनवरी 2023 के हाई कोर्ट के आदेश को बहाल कर दिया है ताकि वह अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी के लिए आवेदन कर सकें।
नौकरी के अधिकार और कानूनी लड़ाई की मुख्य बातें
- Jane Kaushik की तरफ से वकील Shreya Munoth और Amritananda Chakravorty ने दलील दी कि NALSA जजमेंट और 2019 के कानून के बावजूद उन्हें रोजगार में दिक्कतें आ रही हैं।
- अधिवक्ताओं ने बताया कि वह पीजीटी (Postgraduate Teacher) की वैकेंसी के लिए उम्र की सीमा के करीब पहुंच रही हैं, इसलिए जल्द राहत जरूरी थी।
- सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही सरकारी संस्थानों के उदासीन रवैये की आलोचना की है और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों की बात कही है।
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए क्या बन रही है नई पॉलिसी
सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2025 में एक बड़ा फैसला सुनाया था, जिसके तहत जस्टिस Asha Menon की अध्यक्षता में एक 8 सदस्यीय एडवाइजरी कमेटी बनाई गई है। यह कमेटी शिक्षा और रोजगार में समान अवसर (Equal Opportunity Policy) के लिए नियम तैयार कर रही है। केंद्र सरकार को जुलाई 2026 तक एक नेशनल पॉलिसी बनाने का समय दिया गया है, ताकि किसी भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को नौकरी या स्वास्थ्य सेवाओं में भेदभाव का सामना न करना पड़े।