Maharashtra और Delhi के मेडिकल और कानूनी हलकों में इन दिनों गर्भपात कानून (MTP Act) को लेकर बड़ी चर्चा चल रही है। डॉक्टरों और वकीलों का मानना है कि मौजूदा कानून में महिलाओं की अपनी मर्जी से ज्यादा मेडिकल मंजूरी को अहमियत
Maharashtra और Delhi के मेडिकल और कानूनी हलकों में इन दिनों गर्भपात कानून (MTP Act) को लेकर बड़ी चर्चा चल रही है। डॉक्टरों और वकीलों का मानना है कि मौजूदा कानून में महिलाओं की अपनी मर्जी से ज्यादा मेडिकल मंजूरी को अहमियत दी जाती है। हाल ही में Supreme Court ने कई फैसलों में कहा है कि महिलाओं को अपने शरीर पर पूरा अधिकार होना चाहिए और कानून में बदलाव की जरूरत है।
MTP Act में अब तक क्या नियम हैं और क्या बदलाव चाहिए
MTP Act 1971 और 2021 के संशोधन के मुताबिक, सामान्य मामलों में 20 हफ्ते और विशेष श्रेणियों (जैसे रेप सर्वाइवर या नाबालिग) के लिए 24 हफ्ते तक गर्भपात की इजाजत है। 24 हफ्ते के बाद के लिए मेडिकल बोर्ड की राय जरूरी होती है। विशेषज्ञों और Jindal Global Law School की प्रोफेसर दीपिका जैन का कहना है कि गर्भपात को अपराध की श्रेणी से पूरी तरह बाहर करना चाहिए और डॉक्टरों के बजाय महिलाओं को फैसला लेने का पूरा अधिकार मिलना चाहिए।
Supreme Court ने AIIMS और केंद्र सरकार को क्या कहा
अप्रैल और मई 2026 के बीच Supreme Court ने कई अहम बातें कहीं। कोर्ट ने एक 15 साल की बच्ची को 31 हफ्ते की प्रेग्नेंसी खत्म करने की अनुमति देते हुए कहा कि आर्टिकल 21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) कानून की पाबंदियों से ऊपर है। कोर्ट ने AIIMS की उस याचिका को भी खारिज कर दिया जिसमें 30 हफ्ते के गर्भपात का विरोध किया गया था। कोर्ट ने साफ किया कि अगर प्रेग्नेंसी अनचाही है, तो मेडिकल राय महिला की पसंद को नहीं दबा सकती।
डॉक्टरों और कानूनी जानकारों की क्या राय है
मुंबई के सीनियर गाइनेकोलॉजिस्ट डॉ. सुधीर नाइक ने सवाल उठाया है कि कानूनी हस्तक्षेप के बाद डॉक्टरों को बलि का बकरा क्यों बनाया जा रहा है। वहीं, कई वकीलों का तर्क है कि भारत में गर्भपात अभी भी एक ‘अनुमति आधारित’ सुविधा है, जबकि इसे मौलिक अधिकार होना चाहिए। उनका मानना है कि मेडिकल बोर्ड की भूमिका महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों के बीच में आती है, जिसे खत्म किया जाना चाहिए।
Frequently Asked Questions (FAQs)
MTP Act के तहत गर्भपात की समय सीमा क्या है?
सामान्य मामलों में यह सीमा 20 हफ्ते है, जबकि बलात्कार पीड़ितों, नाबालिगों और दिव्यांग महिलाओं के लिए इसे 24 हफ्ते तक बढ़ाया गया है। 24 हफ्ते के बाद केवल मेडिकल बोर्ड की मंजूरी से ही गर्भपात संभव है।
Supreme Court ने हाल ही में क्या बड़ा फैसला सुनाया?
कोर्ट ने कहा कि महिलाओं का अपने शरीर पर अधिकार (Reproductive Autonomy) कानून की समय सीमा से ऊपर है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से नाबालिगों के मामले में समय सीमा हटाने और कानून में बदलाव करने पर विचार करने को कहा है।