Aravallis को लेकर SC की कमेटी पर उठे सवाल, वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने CJI को लिखा पत्र
Rajasthan, Haryana, Delhi: अरावली की पहाड़ियों की परिभाषा और उनके सीमांकन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी बनाई थी। अब इस कमेटी की निष्पक्षता पर बड़े सवाल उठ रहे हैं। देश भर के वैज्ञानिकों, पर्यावरणव
Rajasthan, Haryana, Delhi: अरावली की पहाड़ियों की परिभाषा और उनके सीमांकन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी बनाई थी। अब इस कमेटी की निष्पक्षता पर बड़े सवाल उठ रहे हैं। देश भर के वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और नीति विशेषज्ञों ने इस पैनल की बनावट को लेकर अपनी चिंता जताई है और इस संबंध में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) को पत्र लिखे हैं।
यह पूरा मामला अरावली पहाड़ियों की सही पहचान तय करने से जुड़ा है। दरअसल, नवंबर 2025 में पर्यावरण मंत्रालय (MoEF&CC) ने सुझाव दिया था कि 100 मीटर से ऊंची जमीन को ही अरावली पहाड़ी माना जाए। हालांकि, दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस परिभाषा पर रोक लगा दी थी और एक निष्पक्ष एक्सपर्ट राय मांगी थी। इसी के बाद 25 मई 2026 को कोर्ट ने इस कमेटी का गठन किया, जिसे 31 अगस्त 2026 तक अपनी रिपोर्ट देनी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस कमेटी में ज्यादातर सदस्य या तो सरकार में कार्यरत हैं या रिटायर्ड सरकारी अधिकारी हैं। पर्यावरणविद् डॉ. रवि चोपड़ा ने आशंका जताई है कि ऐसे अधिकारी अक्सर सरकार के विचारों के खिलाफ नहीं जाते। वहीं, वनशक्ति के स्टालिन दयानंद और यूनाइटेड कंजर्वेशन मूवमेंट के जोसेफ हूवर ने मांग की है कि कमेटी को पूरी तरह स्वतंत्र होना चाहिए और इसका पर्यावरण मंत्रालय से कोई सीधा या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं होना चाहिए।
पैनल की बनावट को लेकर कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- चेयरपर्सन: कंचन देवी (DG, ICFRE)
- सदस्य: डॉ. सुभाष आशुतोष, डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा, बृज मोहन सिंह राठौर और प्रोफेसर अशोक के. भटनागर
- विशेष आमंत्रित सदस्य: प्रोफेसर जगदीश कृष्णस्वामी और प्रोफेसर लक्ष्मीकांत शर्मा
- मेंबर सेक्रेटरी: पर्यावरण मंत्रालय का एक डायरेक्टर रैंक का अधिकारी
पर्यावरणविद् नीलम अहलूवालिया ने यह भी आरोप लगाया है कि मंत्रालय ने सितंबर 2025 की एक रिपोर्ट को दबा दिया, जिसमें 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों के पारिस्थितिक महत्व को बताया गया था। विशेषज्ञों का कहना है कि कमेटी में स्वास्थ्य, वन्यजीव, हाइड्रोलॉजी और पारंपरिक आजीविका के जानकारों को भी शामिल किया जाना चाहिए। इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 7 सितंबर 2026 को होगी।