Mumbai में न्यूमरोलॉजी के चक्कर में महिला को नहीं मिला घर, मकान मालिक ने नंबर 4 और 7 का मेल न बैठने पर किया रिजेक्ट
Maharashtra: मुंबई में घर ढूंढना पहले से ही मुश्किल काम है, लेकिन अब इसमें अंधविश्वास का तड़का भी लग गया है। एक महिला को सिर्फ इसलिए किराये पर घर नहीं दिया गया क्योंकि उसका न्यूमरोलॉजी नंबर मकान मालिक की पसंद से नहीं मिल
Maharashtra: मुंबई में घर ढूंढना पहले से ही मुश्किल काम है, लेकिन अब इसमें अंधविश्वास का तड़का भी लग गया है। एक महिला को सिर्फ इसलिए किराये पर घर नहीं दिया गया क्योंकि उसका न्यूमरोलॉजी नंबर मकान मालिक की पसंद से नहीं मिला। इस अजीबोगरीब घटना को इन्फ्लुएंसर Vagmita Singh ने अपने इंस्टाग्राम पर साझा किया है।
Vagmita Singh ने बताया कि उनकी एक दोस्त मुंबई में घर तलाश रही थी। जब वह एक पॉश इलाके की मकान मालिक से मिली, तो मकान मालिक ने उसका न्यूमरोलॉजी नंबर कैलकुलेट किया। मकान मालिक के मुताबिक, महिला का नंबर 7 था और घर का नंबर 4 था। इन दोनों नंबरों का मेल न बैठने की वजह से मकान मालिक ने उसे किरायेदार के रूप में रिजेक्ट कर दिया। इस बात पर नाराजगी जताते हुए Vagmita ने इसे एक मानसिक बीमारी करार दिया है।
सोशल मीडिया पर इस खबर के बाद बहस छिड़ गई है। कुछ लोग इसे मुंबई के किरायेदारों के लिए एक और नई चुनौती बता रहे हैं, तो कुछ लोग नंबर 4 और 7 के तालमेल पर चर्चा कर रहे हैं। भारत के संविधान में अनुच्छेद 14, 15 और 21 समानता और भेदभाव न करने की बात करते हैं। कानूनी जानकारों का कहना है कि कोई भी मकान मालिक धर्म, जाति या लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता, हालांकि न्यूमरोलॉजी जैसे व्यक्तिगत विश्वासों पर किराये के मामलों में कोई स्पष्ट कानून नहीं है।
को-ऑपरेटिव सोसाइटी के बाय-लॉज 24, 68 और 169 किरायेदारों को बुनियादी सुविधाओं से रोकने से बचाते हैं। वैसे तो ऐसी घटनाओं के खिलाफ सिविल कोर्ट या स्थानीय प्रशासन के पास शिकायत की जा सकती है, लेकिन रेंटल हाउसिंग के लिए अभी तक कोई कड़ा एंटी-डिस्क्रिमिनेशन फ्रेमवर्क मौजूद नहीं है। फिलहाल इस मामले में किसी आधिकारिक कानूनी कार्रवाई की खबर नहीं आई है।