Maharashtra: मुंबई के एक प्रोफेशनल Nishant Joshi ने LinkedIn पर एक पोस्ट शेयर की है जिसमें उन्होंने बताया है कि नई पीढ़ी यानी Gen Z के कर्मचारी अब ऑफिस में अपनी क्षमता से ज्यादा काम करने से क्यों बचते हैं। उन्होंने कहा क
Maharashtra: मुंबई के एक प्रोफेशनल Nishant Joshi ने LinkedIn पर एक पोस्ट शेयर की है जिसमें उन्होंने बताया है कि नई पीढ़ी यानी Gen Z के कर्मचारी अब ऑफिस में अपनी क्षमता से ज्यादा काम करने से क्यों बचते हैं। उन्होंने कहा कि कॉर्पोरेट दुनिया में सबसे बड़ी सजा उन लोगों को मिलती है जो बहुत अच्छा काम करते हैं, क्योंकि उन्हें इनाम के बजाय और ज्यादा काम का बोझ दे दिया जाता है।
Gen Z कर्मचारी ज्यादा काम क्यों नहीं करना चाहते?
Nishant Joshi के मुताबिक, जब कोई कर्मचारी उम्मीद से बेहतर काम करता है, तो कंपनी उसे रिवॉर्ड देने के बजाय और ज्यादा जिम्मेदारियां सौंप देती है। इससे कर्मचारी जल्दी थक जाते हैं और मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं। इसी वजह से Gen Z अब सिर्फ उतना ही काम करना पसंद करते हैं जितना उनसे उम्मीद की जाती है, ताकि वे Burnout से बच सकें।
वर्कफोर्स और मेंटल हेल्थ से जुड़े जरूरी आंकड़े
हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत के वर्कफोर्स में Gen Z की स्थिति और उनकी प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया है:
| विषय |
आंकड़े/जानकारी |
| डिस्कनेक्टेड कर्मचारी |
34% Gen Z अपने काम में रुचि नहीं रखते (Ciel HR Services) |
| बर्नआउट (Burnout) |
72% भारतीय कर्मचारी काम के दबाव से थका हुआ महसूस करते हैं |
| मेंटल हेल्थ चिंता |
34% Gen Z के लिए वर्क-लाइफ बैलेंस सबसे बड़ी चिंता है |
| करियर ग्रोथ |
57% नई स्किल सीखने को तरक्की मानते हैं, सिर्फ 12% प्रमोशन को |
| जॉब स्टेबिलिटी |
एक तिहाई कर्मचारी 2-3 साल से ज्यादा एक नौकरी में नहीं रुकना चाहते |
| काम का तरीका |
80% हाइब्रिड और 61% पूरी तरह रिमोट वर्क पसंद करते हैं |
कंपनियों पर इसका क्या असर पड़ रहा है?
साल 2026 तक भारत के वर्कफोर्स में Gen Z की हिस्सेदारी लगभग 27% (करीब 6.4 करोड़ लोग) होने का अनुमान है। कंपनियों के लिए अलग-अलग पीढ़ी के लोगों को एक साथ मैनेज करना मुश्किल हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य और बर्नआउट की वजह से भारत को हर साल करीब 14 बिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान हो रहा है।