Maharashtra: मुंबई की पैथोलॉजिस्ट Dr Roshan Shaikh ने अपनी हिम्मत से एक और बड़ी जीत हासिल की है। दोनों पैरों के बिना (double-amputee) होने के बावजूद, उन्होंने एक कठिन प्रेग्नेंसी के बाद एक स्वस्थ बेटी को जन्म दिया है। Dr
Maharashtra: मुंबई की पैथोलॉजिस्ट Dr Roshan Shaikh ने अपनी हिम्मत से एक और बड़ी जीत हासिल की है। दोनों पैरों के बिना (double-amputee) होने के बावजूद, उन्होंने एक कठिन प्रेग्नेंसी के बाद एक स्वस्थ बेटी को जन्म दिया है। Dr Roshan Shaikh संभवतः भारत की पहली ऐसी छात्रा हैं जिन्होंने 86% दिव्यांगता के साथ MBBS और MD दोनों डिग्रियां पूरी की थीं।
प्रेग्नेंसी के दौरान क्या चुनौतियां आईं?
Dr Roshan Shaikh की प्रेग्नेंसी को डॉक्टरों ने ‘हाई-रिस्क’ श्रेणी में रखा था। इसका मुख्य कारण उनके शरीर पर पड़ने वाला शारीरिक दबाव था, क्योंकि उन्हें प्रोस्थेटिक अंगों (नकली पैर) का सहारा लेना पड़ता है। इसके साथ ही उन्हें जेस्टेशनल डायबिटीज (गर्भावस्था के दौरान शुगर) की समस्या भी हुई, जिसकी वजह से उन्हें लगातार मेडिकल निगरानी में रहना पड़ा।
डिलीवरी और रिकवरी की प्रक्रिया क्या रही?
उन्होंने खारघर के Medicover Hospital में सी-सेक्शन के जरिए 3.2 किलोग्राम की स्वस्थ बेटी को जन्म दिया। उनकी डॉक्टर Dr Swapna Dahe ने बताया कि सर्जरी के बाद प्रोस्थेटिक अंगों की मदद से जल्दी चलना-फिरना और फिजियोथेरेपी बहुत जरूरी थी। इससे शरीर में खून के थक्के जमने का खतरा कम हो जाता है और रिकवरी तेजी से होती है।
मेडिकल शिक्षा के लिए लड़ी थी कानूनी लड़ाई
Dr Roshan Shaikh ने साल 2011 में बॉम्बे हाई कोर्ट में एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी थी। इस लड़ाई का मकसद 80% से ज्यादा दिव्यांगता के बावजूद मेडिकल की पढ़ाई जारी रखना था। उनकी इस जीत ने भारत में मेडिकल एजुकेशन के नियमों में बदलाव किया और अन्य दिव्यांग छात्रों के लिए रास्ते खोले।
Frequently Asked Questions (FAQs)
Dr Roshan Shaikh की प्रेग्नेंसी हाई-रिस्क क्यों थी?
उनकी प्रेग्नेंसी हाई-रिस्क थी क्योंकि वह डबल-एम्प्यूटी हैं और प्रोस्थेटिक अंगों का इस्तेमाल करती हैं, जिससे शरीर पर दबाव बढ़ता है। साथ ही उन्हें जेस्टेशनल डायबिटीज की समस्या भी थी।
डॉक्टर ने उन्हें रिकवरी के लिए क्या सलाह दी?
ऑब्स्टेट्रीशियन Dr Swapna Dahe ने सलाह दी कि सर्जरी के बाद प्रोस्थेटिक अंगों के साथ जल्दी चलना-फिरना और फिजियोथेरेपी करना जरूरी है ताकि ब्लड क्लॉट्स का खतरा कम हो सके।