Maharashtra में मराठा आरक्षण पर Bombay HC की सुनवाई, कोर्ट ने पूछा- क्या दबदबा रखने वाली जाति ‘पिछड़ी’ हो सकती है
Maharashtra: राज्य में मराठा आरक्षण की मांग दशकों पुरानी है, जिसे लेकर अक्सर विरोध प्रदर्शन और तनाव देखा जाता है। अब यह मामला Bombay High Court में है, जहां कोर्ट इस बात की जांच कर रहा है कि क्या एक राजनीतिक रूप से प्रभा
Maharashtra: राज्य में मराठा आरक्षण की मांग दशकों पुरानी है, जिसे लेकर अक्सर विरोध प्रदर्शन और तनाव देखा जाता है। अब यह मामला Bombay High Court में है, जहां कोर्ट इस बात की जांच कर रहा है कि क्या एक राजनीतिक रूप से प्रभावशाली समुदाय को ‘पिछड़ा’ मानकर उन्हें शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जा सकता है।
मामले की गहराई में जाते हुए कोर्ट यह देख रहा है कि क्या वह समुदाय जो राजनीतिक और आर्थिक रूप से मजबूत है, आरक्षण के लिए पात्रता रखता है। राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर राजेश्वरी देशपांडे जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि मराठा समुदाय का महाराष्ट्र में ऐतिहासिक रूप से सामाजिक और सांस्कृतिक दबदबा रहा है। उनके पास जमीन का बड़ा हिस्सा है और वित्तीय स्थिति भी मजबूत है। यह दलील भी दी गई कि 1960 के बाद से महाराष्ट्र के ज्यादातर मुख्यमंत्री इसी समुदाय से रहे हैं, जो उनके राजनीतिक प्रभाव को दिखाता है।
आरक्षण को लेकर कानूनी उलझनें काफी समय से चल रही हैं। फरवरी 2024 में महाराष्ट्र सरकार ने मराठा समुदाय को शिक्षा और नौकरियों में 10% आरक्षण देने वाला कानून पास किया था। अप्रैल 2024 में एक अंतरिम आदेश के जरिए इसे साल 2025 तक जारी रखने की अनुमति मिली, लेकिन इस कानून को कई याचिकाओं के जरिए चुनौती दी गई है। इसके अलावा, सितंबर 2025 में सरकार ने एक GR जारी किया था जिससे मराठा समुदाय के लोग कुनबी जाति प्रमाण पत्र ले सकते थे, ताकि उन्हें OBC कैटेगरी का लाभ मिले। इस GR को भी PIL के जरिए कोर्ट में चुनौती दी गई है।
इससे पहले मई 2021 में Supreme Court ने मराठा आरक्षण के पुराने कानून (SEBC Act, 2018) को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि यह 50% की आरक्षण सीमा का उल्लंघन है और राज्यों के पास पिछड़ी जातियों की पहचान करने का अधिकार नहीं है। फिलहाल Bombay High Court की विशेष बेंच इन सभी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जबकि मनोज जरांगे-पाटिल जैसे कार्यकर्ता लगातार आरक्षण की मांग कर रहे हैं।