Maharashtra की जेलों में बंद कैदियों को मिल रहा हुनर, पर ट्रेनिंग प्रोग्राम्स के सामने हैं बड़ी चुनौतियां

Maharashtra: मुंबई की Arthur Road जेल के पूर्व कैदी बच्चू खान ने जेल में रहते हुए वॉल-पेंटिंग का कोर्स किया और अब वह दुबई में नौकरी करने का सपना देख रहे हैं। बच्चू का मानना था कि यह काम दिलचस्प है और इससे वह बाहर निकलकर

Maharashtra: मुंबई की Arthur Road जेल के पूर्व कैदी बच्चू खान ने जेल में रहते हुए वॉल-पेंटिंग का कोर्स किया और अब वह दुबई में नौकरी करने का सपना देख रहे हैं। बच्चू का मानना था कि यह काम दिलचस्प है और इससे वह बाहर निकलकर कॉन्ट्रैक्ट लेकर अपनी रोजी-रोटी कमा सकते हैं। हालांकि, जेलों में ऐसे ट्रेनिंग प्रोग्राम्स को जमीन पर उतारना काफी मुश्किल साबित हो रहा है।

India Justice Report 2025 के मुताबिक, भारत की जेलों में बंद कुल कैदियों में से 76% ऐसे लोग हैं जिनका ट्रायल अभी चल रहा है (undertrials)। इनमें से करीब 49% युवा 18 से 30 साल की उम्र के बीच के हैं। इन लोगों को हुनर सिखाने के लिए कई कोशिशें हो रही हैं, जैसे महाराष्ट्र की जेलों में TISS और JSW Dulux Academy मिलकर पेंटिंग कोर्स चला रहे हैं। वहीं दिल्ली की Tihar जेल में Max Healthcare के साथ मिलकर ‘Parambh’ प्रोग्राम शुरू किया गया है, जिससे 1,200 कैदियों को ट्रेनिंग दी जा रही है।

इन सुधारों के लिए सरकार ने Model Prisons Act 2023 तैयार किया है, जिसका मकसद जेलों को सिर्फ सजा देने की जगह नहीं बल्कि सुधार केंद्र बनाना है। महाराष्ट्र सरकार ने भी Maharashtra Prisons and Correctional Services Bill 2025 पास किया है। इस बिल में ‘ओपन जेल’ और ‘ओपन कॉलोनी’ बनाने और महिलाओं व ट्रांसजेंडर कैदियों के लिए खास इंतजाम करने की बात कही गई है। साथ ही हर जिले में एक कमेटी होगी जो ट्रायल में फंसे कैदियों के मामलों की समय-समय पर समीक्षा करेगी।

इतने नियमों के बावजूद असल चुनौती जेल के अंदर है। Arthur Road जेल के सुपरिटेंडेंट हर्षद अहिरराव ने बताया कि सबसे बड़ी दिक्कत जगह की कमी है, जिसकी वजह से ट्रेनिंग क्लास नहीं लग पातीं। इसके अलावा, कई अंडरट्रायल कैदी इस उम्मीद में कोर्स नहीं करते कि वे जल्द ही जमानत पर बाहर आ जाएंगे, जबकि असलियत में वे सालों तक वहीं फंसे रहते हैं।

जेल सुधार की राह में कुछ और बड़ी बाधाएं भी हैं:

  • जेलों में क्षमता से ज्यादा कैदियों का होना।
  • दलित, मुस्लिम और आदिवासी समुदायों के लोगों की जेलों में ज्यादा संख्या होना।
  • कैदियों को जेल में आने से लेकर बाहर जाने तक के लिए किसी पुख्ता गाइडेंस सिस्टम का न होना।
  • पुनर्वास (rehabilitation) के बजाय सिर्फ कैद रखने पर ज्यादा खर्च होना।