Maharashtra में IVF के लिए अंडे बेचने को मजबूर महिलाएं, गरीबी और मजबूरी के बीच चल रहा बड़ा खेल

Maharashtra: मुंबई और उसके आसपास के इलाकों में IVF इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इस चमक के पीछे कई महिलाओं की मजबूरी छिपी है। उल्हासनगर की रहने वाली 29 साल की प्रभा इसका एक बड़ा उदाहरण हैं, जो अपनी 9 साल की बेटी के

Maharashtra: मुंबई और उसके आसपास के इलाकों में IVF इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इस चमक के पीछे कई महिलाओं की मजबूरी छिपी है। उल्हासनगर की रहने वाली 29 साल की प्रभा इसका एक बड़ा उदाहरण हैं, जो अपनी 9 साल की बेटी के लिए एक किराए का घर लेने की चाहत में हर दिन दो घंटे का सफर तय कर मुंबई के क्लिनिक में हार्मोनल इंजेक्शन लगवाने जाती थीं ताकि उनके अंडे किसी दूसरी महिला के इलाज के लिए निकाले जा सकें।

भारत में अंडे का दान (Egg Donation) अब Assisted Reproductive Technology (Regulation) Act, 2021 और Surrogacy Act, 2021 के तहत आता है। कानून के मुताबिक, अंडा दान करने वाली महिला शादीशुदा होनी चाहिए, उसकी उम्र 21 से 35 साल के बीच होनी चाहिए और उसका कम से कम एक तीन साल का जैविक बच्चा होना चाहिए। नियम यह भी कहते हैं कि एक महिला अपने जीवन में केवल एक बार अंडा दान कर सकती है और एक साइकिल में अधिकतम सात अंडे ही निकाले जा सकते हैं।

सरकारी नियमों के अनुसार, अंडों की व्यावसायिक बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित है। महिलाओं को अंडों के बदले पैसे नहीं, बल्कि उनके समय और परेशानी के लिए ‘उचित मुआवजा’ दिया जाता है, जो आमतौर पर 25,000 रुपये से 75,000 रुपये तक होता है, हालांकि कुछ मामलों में यह 1.5 लाख रुपये तक भी हो सकता है। इसके बावजूद, गरीबी का फायदा उठाकर कई अवैध गिरोह सक्रिय हैं जो इन नियमों को ताक पर रखकर महिलाओं का शोषण करते हैं।

हाल ही में महाराष्ट्र के बदलापुर में पुलिस ने एक ऐसे ही अवैध रैकेट का भंडाफोड़ किया था। जांच में सामने आया कि करीब 30 महिलाओं से 250 से ज्यादा बार अवैध तरीके से अंडे निकाले गए थे, जिनमें से एक महिला से तो 37 बार यह प्रक्रिया कराई गई।

डॉक्टरों का कहना है कि भारत में अंडा दाताओं की कमी हो रही है क्योंकि महिलाएं अब देर से बच्चे पैदा कर रही हैं और 32 साल की उम्र के बाद ओवेरियन रिजर्व कम होने लगता है। वहीं, IVF का खर्च 1.5 लाख से 4.5 लाख रुपये तक होने के कारण कई जोड़े आर्थिक दबाव महसूस करते हैं, जिसे ‘इनफर्टिलिटी फटीग’ कहा जा रहा है। इसके चलते कई लोग इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं।