Lucknow की चांदी की चप्पलें फिर हुईं चर्चा में, सेहत के दावे और नवाबों के दौर की विरासत की पूरी कहानी
Lucknow: लखनऊ की पुरानी गलियों में बनने वाली चांदी की चप्पलें एक बार फिर चर्चा में हैं। ये चप्पलें न केवल अपनी खूबसूरती के लिए जानी जाती हैं, बल्कि कई लोग इन्हें सेहत के लिए भी फायदेमंद मानते हैं। चौक इलाके के कुछ खास का
Lucknow: लखनऊ की पुरानी गलियों में बनने वाली चांदी की चप्पलें एक बार फिर चर्चा में हैं। ये चप्पलें न केवल अपनी खूबसूरती के लिए जानी जाती हैं, बल्कि कई लोग इन्हें सेहत के लिए भी फायदेमंद मानते हैं। चौक इलाके के कुछ खास कारीगर परिवार आज भी इस सदियों पुरानी कला को जिंदा रखे हुए हैं, जो कभी मुगल और अवध के नवाबों की पसंद हुआ करती थी।
दुकानदारों और पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, चांदी की चप्पल पहनने से शरीर का तापमान संतुलित रहता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी बढ़ती है। कुछ लोग मानते हैं कि इससे तनाव कम होता है और पैरों की सूजन व दर्द में राहत मिलती है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इन दावों के वैज्ञानिक प्रमाण सीमित हैं। हड्डियों के मजबूत होने जैसी बातों का कोई पुख्ता वैज्ञानिक आधार नहीं मिला है, क्योंकि चांदी और हड्डियों के बीच सीधा संपर्क संभव नहीं है।
इस कला की खासियत लखनऊ के कुछ चुनिंदा परिवारों के पास है। दिलावर हुसैन और अजहर हुसैन का परिवार तीन पीढ़ियों से यह काम कर रहा है, जबकि मोहम्मद हुसैन के परिवार में यह हुनर पांच-छह पीढ़ियों से चला आ रहा है। आफिया खान भी इसी पारंपरिक शिल्प को आगे बढ़ा रही हैं। इन चप्पलों को बनाने के लिए शुद्ध चांदी को पिघलाकर पतली चादरें बनाई जाती हैं, फिर हथौड़े और छोटे औजारों से उन पर बारीक नक्काशी की जाती है। एक जोड़ी चप्पल में लगभग 250 से 300 ग्राम चांदी का इस्तेमाल होता है और इसका तला रबर का होता है।
साल 2026 के अपडेट के मुताबिक, शादियों के सीजन में दूल्हा और दुल्हन के लिए इन चांदी की जूतियों की मांग फिर से बढ़ी है। हालांकि, नई पीढ़ी की कम रुचि और मेहनत के मुकाबले कम कमाई इस कला के लिए चुनौती बनी हुई है। अब कई कारीगर अपनी इस विरासत को बचाने और नए ग्राहकों तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं। कारीगरों का दावा है कि लखनऊ की इस कारीगरी की नकल करने की कोशिश कई लोगों ने की, लेकिन आज तक कोई इसकी बराबरी नहीं कर पाया।