UP : लखनऊ की पुरानी संस्कृति में तवायफों का स्थान सिर्फ नाच-गाने तक सीमित नहीं था। पुराने लखनऊ में वे समाज को शिष्टाचार, भाषा और तहजीब सिखाने का काम करती थीं। उस दौर में कोठों को एक तरह का भाषा स्कूल माना जाता था जहाँ लो
UP : लखनऊ की पुरानी संस्कृति में तवायफों का स्थान सिर्फ नाच-गाने तक सीमित नहीं था। पुराने लखनऊ में वे समाज को शिष्टाचार, भाषा और तहजीब सिखाने का काम करती थीं। उस दौर में कोठों को एक तरह का भाषा स्कूल माना जाता था जहाँ लोग संस्कार सीखने आते थे।
तवायफों का सांस्कृतिक योगदान क्या था
पुराने लखनऊ में तवायफें संगीत और नृत्य के साथ-साथ शिष्टाचार और भाषा की शिक्षा देने में बड़ी भूमिका निभाती थीं। नवाब आसिफुद्दौला ने 1775 में लखनऊ को अवध की राजधानी बनाया था, जिसके बाद यह शहर हिंदुस्तानी संगीत का बड़ा केंद्र बन गया। नवाब वाजिद अली शाह के समय तक संगीत अपनी ऊंचाई पर पहुंच गया और तवायफों ने इस परंपरा को बचाने में मदद की।
कोठों पर कलाकारों के बीच क्या अंतर था
पुराने समय में कोठों पर काम करने वाली महिलाओं को उनके काम के आधार पर अलग-अलग नामों से जाना जाता था। जो महिलाएं सिर्फ गाना गाती थीं उन्हें ‘कोबाई’ कहा जाता था। जो गायन और नृत्य दोनों में माहिर थीं उन्हें ‘जान’ कहा जाता था। वहीं, पुरुषों के साथ संबंध रखने वाली महिलाओं को ‘वेश्या’ के रूप में पहचाना जाता था।
इतिहास की कुछ खास बातें
लखनऊ की इस संस्कृति का प्रभाव इतना था कि 1920 में लखनऊ नगर पालिका बोर्ड के चुनाव में दिलरूबा जान नाम की एक तवायफ ने चुनाव लड़ा था। आज के समय में यूपी दिवस और महिंद्रा सनतकदा लखनऊ महोत्सव जैसे कार्यक्रमों के जरिए इस समृद्ध विरासत को याद किया जाता है। शहर का माहौल बदल रहा है, इसलिए इस बिखरी हुई संस्कृति को सहेजने की जरूरत महसूस की जा रही है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
पुराने लखनऊ में तवायफों को भाषा का स्कूल क्यों कहा जाता था
क्योंकि वे केवल संगीत और नृत्य नहीं सिखाती थीं, बल्कि समाज के लोगों को सही भाषा, बात करने का तरीका और तहजीब की शिक्षा भी देती थीं।
कोबाई और जान में क्या अंतर था
कोबाई उन महिलाओं को कहा जाता था जो सिर्फ गायन करती थीं, जबकि जान उन्हें कहा जाता था जो गायन और नृत्य दोनों में निपुण थीं।