UP: लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के यूरोलॉजी विभाग में महंगी दवाओं की खरीद और इस्तेमाल को लेकर एक बड़ा मामला सामने आया है। कैंसर मरीजों को दी जाने वाली दवाओं के रिकॉर्ड में भारी हेराफेरी की आशंका है, जिसस
UP: लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के यूरोलॉजी विभाग में महंगी दवाओं की खरीद और इस्तेमाल को लेकर एक बड़ा मामला सामने आया है। कैंसर मरीजों को दी जाने वाली दवाओं के रिकॉर्ड में भारी हेराफेरी की आशंका है, जिससे करोड़ों रुपये के घोटाले की बात कही जा रही है। अस्पताल प्रशासन ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच तेज कर दी है।
अधिकारियों को शक कैसे हुआ और क्या है पूरा मामला
दवाओं की खपत में अचानक आई बढ़ोतरी ने अधिकारियों का ध्यान खींचा। अक्टूबर-नवंबर 2025 में यूरोलॉजी विभाग में दवाओं का मासिक खर्च करीब 10 लाख रुपये था, जो फरवरी 2026 तक बढ़कर 40 लाख और मार्च 2026 में 45 लाख रुपये से ज्यादा हो गया। जब बिलों और डॉक्टरों के पर्चों की जांच हुई, तो पता चला कि 8 से 10 हजार रुपये वाले महंगे इंजेक्शन, जो छह महीने में एक बार लगने चाहिए थे, उन्हें कागजों पर एक ही महीने में कई बार लगाया गया दिखाया गया। शुरुआती अनुमान के मुताबिक यह घोटाला 2 से 3 करोड़ रुपये का हो सकता है।
KGMU प्रशासन ने अब तक क्या कार्रवाई की है
मामला सामने आने के बाद कुलपति ने सभी संबंधित दवाओं और इंजेक्शनों के बिलों के भुगतान पर तुरंत रोक लगा दी है। दवा काउंटर पर तैनात संविदाकर्मियों को हटाकर विभागाध्यक्ष कार्यालय से संबद्ध कर दिया गया है। सबूतों के साथ छेड़छाड़ रोकने के लिए दवा वितरण से जुड़े कर्मचारियों को लखनऊ छोड़ने पर रोक लगा दी गई है। मामले की गहराई से जांच के लिए पांच सदस्यों की एक हाई लेवल कमेटी बनाई गई है।
आगे क्या होगा और दोषियों पर क्या एक्शन लिया जाएगा
KGMU प्रवक्ता डॉ. केके सिंह ने बताया कि जांच कमेटी अपनी रिपोर्ट जल्द सौंपेगी। रिपोर्ट में दोषी पाए जाने वाले कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त की जाएंगी और उनसे पैसों की रिकवरी भी की जाएगी। साथ ही, दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की तैयारी है। बता दें कि KGMU में पहले भी दवाओं की खरीद और मशीनों के संचालन को लेकर अनियमितताओं के आरोप लग चुके हैं।
Frequently Asked Questions (FAQs)
KGMU में दवाओं के घोटाले का अनुमान कितना है
शुरुआती जांच में कैंसर, आयरन और प्रोटीन के महंगे इंजेक्शनों की संदिग्ध खपत के जरिए लगभग 2 से 3 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितता का अनुमान लगाया गया है।
दवाओं के वितरण में किस तरह की गड़बड़ी पाई गई
नियम के मुताबिक जिन इंजेक्शनों को छह महीने में एक बार लगाया जाना चाहिए था, उन्हें रिकॉर्ड में एक ही महीने के भीतर कई बार लगाया गया दिखाया गया।