Lucknow की चिकनकारी को मिला GI टैग, मशीन और हाथ की कढ़ाई में फर्क पहचानना हुआ जरूरी
Lucknow: लखनऊ की मशहूर चिकनकारी कढ़ाई सिर्फ एक काम नहीं बल्कि शहर की पहचान और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत है। स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों का मानना है कि इस कला को बनाने में बहुत समय और लगन लगती है, जिसकी वजह से यह दू
Lucknow: लखनऊ की मशहूर चिकनकारी कढ़ाई सिर्फ एक काम नहीं बल्कि शहर की पहचान और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत है। स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों का मानना है कि इस कला को बनाने में बहुत समय और लगन लगती है, जिसकी वजह से यह दूसरे शहरों और विदेशों में ज्यादा पसंद की जाती है।
असली चिकनकारी की सबसे बड़ी खूबी इसकी बारीकी है। इसमें फूल-पत्तियों, बेल-बूटों और जाली जैसे पारंपरिक डिजाइन सफेद या रंगीन धागों से कपड़े पर उकेरे जाते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, हाथ से की गई कढ़ाई में एक खास गहराई और उभार होता है, जबकि मशीन से बनी कढ़ाई सपाट और एक जैसी दिखती है। हाथ से बनी जाली इसकी सबसे खास पहचान है, क्योंकि इसमें कपड़े के धागों को बिना काटे उन्हें अलग करके जाली तैयार की जाती है, जिसे मशीन से बनाना मुश्किल होता है।
इस कला की लोकप्रियता के कारण अब बाजार में नकली और मशीन से बनी चिकनकारी भी आने लगी है। ऐसे में ग्राहकों के लिए असली और नकली की पहचान करना जरूरी हो गया है। लखनऊ चिकनकारी को भौगोलिक संकेत (GI) टैग मिल चुका है, जो इसकी शुद्धता और पारंपरिक उत्पत्ति की आधिकारिक पुष्टि करता है। अब खरीदारी करते समय लोग कपड़े पर लगे टैग को देखकर इसकी प्रामाणिकता की जांच कर सकते हैं।
इस काम में सूती, मलमल, लिनन, सिल्क, जॉर्जेट और शिफॉन जैसे कपड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। लखनऊ के कारीगरों की इस मेहनत की वजह से ही आज यह कला पूरी दुनिया में मशहूर है और इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।