Lucknow: KGMU में CAG की टीम कर रही है वित्तीय रिकॉर्ड की जांच, दवा खरीद में करोड़ों के घोटाले का शक
Lucknow: राजधानी के किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) में पैसों के लेन-देन और खरीद प्रक्रिया की बड़ी जांच शुरू हो गई है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की चार सदस्यों वाली एक टीम 15 जुलाई से अस्पताल मे
Lucknow: राजधानी के किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) में पैसों के लेन-देन और खरीद प्रक्रिया की बड़ी जांच शुरू हो गई है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की चार सदस्यों वाली एक टीम 15 जुलाई से अस्पताल में मौजूद है। यह टीम 4 अगस्त तक अलग-अलग विभागों के रिकॉर्ड खंगालेगी ताकि यह पता चल सके कि सरकारी पैसे का इस्तेमाल सही तरीके से हुआ है या नहीं।
CAG की यह टीम मुख्य रूप से मशीनों की खरीद, टेंडर की प्रक्रिया, पेमेंट और प्रशासनिक फैसलों की जांच कर रही है। अगर इस ऑडिट में कोई वित्तीय गड़बड़ी या नियमों की अनदेखी पाई जाती है, तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
यह पूरी जांच उस समय हो रही है जब KGMU में दवा खरीद को लेकर पहले ही विवाद खड़ा हो चुका है। 2 जून 2026 को विश्वविद्यालय ने असाध्य योजना के तहत दवाइयों की खरीद में करीब 2.5 करोड़ रुपये की गड़बड़ी के मामले में चार कर्मचारियों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की बात कही थी। शुरुआती जांच में कैंसर की महंगी दवाओं के दुरुपयोग और हेरफेर के जरिए लगभग 2 करोड़ रुपये के घोटाले का अनुमान लगाया गया था।
KGMU के प्रवक्ता डॉ. केके सिंह ने बताया कि इस मामले में तीन संविदा कर्मचारियों को काम से हटा दिया गया है और एक पांच सदस्यीय कमेटी बनाई गई है। वहीं, 5 जून 2026 को यूरोलॉजी विभाग में मिली गड़बड़ियों के बाद जांच का दायरा बढ़ाया गया। अब रेडियोथेरेपी, सर्जिकल ऑन्कोलॉजी, प्रसूति एवं स्त्री रोग और मेडिकल ऑन्कोलॉजी समेत सात अन्य विभागों के दवा वितरण के रिकॉर्ड की भी जांच हो रही है।
उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने 6 जून 2026 को स्पष्ट किया था कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और धोखाधड़ी के हर पहलू की गहराई से जांच होगी। कुलपति प्रोफेसर सोनिया नित्यानंद ने भी निष्पक्ष जांच का भरोसा दिया है।
जांच में यह बात सामने आई कि दवाइयों का खर्च अचानक बहुत बढ़ गया था। अक्टूबर-नवंबर 2025 में जहां यह खर्च 10 लाख रुपये महीना था, वहीं फरवरी 2026 में यह बढ़कर 40 लाख और मार्च 2026 में 45 लाख रुपये से ज्यादा हो गया। जांच में पाया गया कि 8 से 10 हजार रुपये वाले महंगे इंजेक्शन बहुत कम समय में कई बार दिए गए और कुछ ऐसे मरीजों के नाम पर भी दवाइयां निकाली गईं जो अस्पताल में भर्ती ही नहीं थे। अब अस्पताल दवा वितरण के लिए ओटीपी (OTP) आधारित सत्यापन सिस्टम लागू करने पर विचार कर रहा है।