Bihar, Gaya: मोहनपुर प्रखंड के चौवारी गांव से सामाजिक बदलाव की एक अनोखी तस्वीर सामने आई है। यहां एक परिवार के सदस्यों ने सदियों पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए महिलाओं को अर्थी को कंधा देने की जिम्मेदारी सौंपी। परिवार की बेट
Bihar, Gaya: मोहनपुर प्रखंड के चौवारी गांव से सामाजिक बदलाव की एक अनोखी तस्वीर सामने आई है। यहां एक परिवार के सदस्यों ने सदियों पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए महिलाओं को अर्थी को कंधा देने की जिम्मेदारी सौंपी। परिवार की बेटियों और बहुओं ने मिलकर शव को कंधा दिया और श्मशान घाट तक अंतिम विदाई दी। इस दौरान पूरा माहौल ‘जीवन-मरण सत्य है’ के नारों से गूंज उठा। समाज की पुरानी मान्यताओं को पीछे छोड़कर ली गई इस पहल की अब पूरे जिले में चर्चा हो रही है।
चौवारी गांव में बेटियों और बहुओं ने कैसे निभाई जिम्मेदारी?
आमतौर पर हिंदू धर्म में पुरुषों को ही अर्थी को कंधा देने और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी करने का अधिकार दिया जाता रहा है। लेकिन मोहनपुर के इस परिवार ने इस सोच को बदलने की कोशिश की है। महिलाओं ने न केवल अर्थी को कंधा दिया बल्कि अंतिम यात्रा में भी प्रमुख भूमिका निभाई। परिवार के लोगों का कहना है कि दुख के समय में बेटियां और बहुएं भी बेटों के बराबर हैं, इसलिए उन्हें यह हक मिलना चाहिए। इस फैसले से गांव के लोग भी काफी प्रभावित नजर आए।
मृत्युभोज और कर्मकांड को लेकर परिवार का क्या फैसला रहा?
इस परिवार ने समाज में एक और नई मिसाल पेश की है। अंतिम संस्कार के बाद होने वाले भारी-भरकम कर्मकांड और मृत्युभोज के आयोजन से परिवार ने पूरी तरह इनकार कर दिया है। परिवार का मानना है कि मृत्यु के बाद फिजूलखर्ची और भोज का कोई औचित्य नहीं है। मोहनपुर के संदीप कुमार की रिपोर्ट के मुताबिक, परिवार ने इस फैसले के जरिए समाज को यह संदेश देने की कोशिश की है कि पुरानी और अनावश्यक रूढ़ियों को त्यागना समय की मांग है। इस कदम को समाज में एक सकारात्मक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।