Delhi में 70 हजार लोगों पर बेदखली का खतरा, पाकिस्तान से आए विस्थापितों की तीसरी पीढ़ी अब हो रही बेघर
Delhi: राजधानी के भाटी माइंस इलाके में स्थित संजय कॉलोनी के करीब 70,000 लोग इस समय अपने घरों से निकाले जाने के डर में हैं। इन लोगों में सबसे ज्यादा वे परिवार हैं जिनकी पहली पीढ़ी 1947 के विभाजन के समय पाकिस्तान से विस्था
Delhi: राजधानी के भाटी माइंस इलाके में स्थित संजय कॉलोनी के करीब 70,000 लोग इस समय अपने घरों से निकाले जाने के डर में हैं। इन लोगों में सबसे ज्यादा वे परिवार हैं जिनकी पहली पीढ़ी 1947 के विभाजन के समय पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत आई थी। अब उनकी तीसरी पीढ़ी को बेदखली का नोटिस मिला है।
प्रभावित लोगों का कहना है कि इस कॉलोनी को सरकार ने ही बसाया था और यहां बुनियादी सुविधाएं भी दी गई थीं। लेकिन अब प्रशासन इसे रिज क्षेत्र बताकर खाली कराने की कोशिश कर रहा है। संजय कॉलोनी को 1976 में संजय गांधी ने बसाया था और पहले यहां के लोग गांव सभा के मतदाता थे। हालांकि, 1991 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद इस पूरे इलाके को वन विभाग के अधीन कर दिया गया और इसे वन्यजीव अभयारण्य घोषित कर दिया गया। इसी वजह से अब निवासियों को संरक्षित भूमि पर अतिक्रमण करने वाला बताया जा रहा है।
इस मामले में नव युवक ग्राम विकास समिति ने दक्षिण दिल्ली के एडीएम से गुहार लगाई है कि उनके आवासीय दर्जे को मान्यता दी जाए और उन्हें रिज अधिसूचना से बाहर रखा जाए। समिति का तर्क है कि निवासियों को 1976 और 1987 में आधिकारिक तौर पर यहां बसाया गया था। वहीं, निवासी कल्याण संघ (RWA) ने लोगों को ऐतिहासिक सबूतों के साथ सुप्रीम कोर्ट जाने की सलाह दी है।
दूसरी तरफ, लुटियंस दिल्ली के सुजान सिंह पार्क और एंबेसडर होटल में रहने वाले विस्थापित परिवारों पर भी बेदखली की तलवार लटकी है। केंद्र सरकार का कहना है कि इन संपत्तियों के पट्टे की अवधि 1960 में ही खत्म हो गई थी, जबकि प्रभावित पक्ष इसे अदालत में चुनौती दे रहे हैं। दिल्ली स्लम और जेजे पुनर्वास नीति 2015 के मुताबिक, बिना उचित पुनर्वास व्यवस्था के बेदखली नहीं की जा सकती और वैकल्पिक आवास 5 किलोमीटर के दायरे में देना जरूरी है।