Delhi: दिल्ली की हवा और हरियाली में अब चंदन की खुशबू घुलने वाली है। साल 2022-23 में लगाए गए चंदन के पौधे अब धीरे-धीरे पेड़ों का रूप ले रहे हैं। खास तौर पर अरावली और नीला हौज बायोडायवर्सिटी पार्क में इसके बहुत अच्छे परिणा
Delhi: दिल्ली की हवा और हरियाली में अब चंदन की खुशबू घुलने वाली है। साल 2022-23 में लगाए गए चंदन के पौधे अब धीरे-धीरे पेड़ों का रूप ले रहे हैं। खास तौर पर अरावली और नीला हौज बायोडायवर्सिटी पार्क में इसके बहुत अच्छे परिणाम सामने आए हैं, जहाँ कुछ पेड़ों पर फूल और बीज भी देखे गए हैं।
चंदन के पौधों की ग्रोथ और मौजूदा स्थिति क्या है
उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना की पहल पर दिल्ली में चंदन लगाने का काम शुरू हुआ था। अरावली बायोडायवर्सिटी पार्क की नर्सरी में लगाए गए 20 पौधों में से 15 अब पेड़ बन चुके हैं और पिछले साल जून-जुलाई में एक पेड़ पर फूल भी खिले थे। वहीं नीला हौज बायोडायवर्सिटी पार्क में लगाया गया एक पौधा जो पहले सिर्फ 2-3 फीट का था, अब बढ़कर 12 फीट लंबा हो गया है और उस पर दो बीज भी आए हैं।
वैज्ञानिकों ने कैसे उगाए दिल्ली में चंदन के पेड़
चंदन उगाना आसान नहीं था क्योंकि इसे पोषण के लिए दूसरे पौधों की जरूरत होती है। वैज्ञानिकों ने कोयंबटूर से लाए गए बीजों को जिबरेलिक एसिड और पानी के साथ अंकुरित किया। चंदन एक परजीवी पौधा है, इसलिए इसे नाइट्रोजन और पानी देने के लिए अरहर (कबूतर मटर) जैसे सहायक पौधों के साथ लगाया गया। फिलहाल इन पेड़ों का इस्तेमाल रिसर्च के लिए किया जा रहा है।
किन एजेंसियों को मिले पौधे लगाने के निर्देश
उपराज्यपाल ने मानसून के दौरान 10,000 चंदन के पौधे लगाने का निर्देश कई संस्थाओं को दिया था। इसमें Delhi Development Authority (DDA), Municipal Corporation of Delhi (MCD), New Delhi Municipal Council (NDMC), दिल्ली पार्क्स एंड गार्डन सोसाइटी और दिल्ली बायोडायवर्सिटी सोसाइटी शामिल हैं। हालांकि, दिल्ली वृक्ष संरक्षण अधिनियम 1994 के तहत व्यावसायिक तौर पर पेड़ों को काटना मना है, जो आगे चलकर एक चुनौती बन सकता है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
दिल्ली में चंदन के पौधे कहाँ सबसे अच्छे तरीके से बढ़ रहे हैं?
दिल्ली के अरावली और नीला हौज बायोडायवर्सिटी पार्क में चंदन के पौधों की ग्रोथ सबसे अच्छी रही है, जहाँ पौधे अब पेड़ों में बदल रहे हैं।
चंदन के पौधों को उगाने के लिए क्या खास तकनीक अपनाई गई?
वैज्ञानिकों ने कोयंबटूर के बीजों का इस्तेमाल किया और उन्हें पोषण देने के लिए अरहर जैसे सहायक पौधों के साथ लगाया।