Delhi-NCR बना ओजोन प्रदूषण का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट, गर्मी में बढ़ रहा है खतरा; कई शहरों के लिए चेतावनी

Delhi: दिल्ली-एनसीआर में अब केवल सर्दियों का प्रदूषण ही समस्या नहीं है, बल्कि गर्मियों में ओजोन प्रदूषण एक गंभीर चुनौती बन गया है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) ने 2021 से 2026 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया है,

Delhi: दिल्ली-एनसीआर में अब केवल सर्दियों का प्रदूषण ही समस्या नहीं है, बल्कि गर्मियों में ओजोन प्रदूषण एक गंभीर चुनौती बन गया है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) ने 2021 से 2026 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया है, जिसमें दिल्ली-एनसीआर को देश का सबसे बड़ा ओजोन हॉटस्पॉट बताया गया है। यह प्रदूषण अब दिन के साथ-साथ रात में भी हवा में जमा रह रहा है।

CSE की रिपोर्ट के मुताबिक, 1 मार्च से 10 मई 2026 के बीच 71 दिनों तक दिल्ली-एनसीआर में ओजोन का स्तर तय मानक 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से ऊपर रहा। सबसे चिंता की बात यह है कि यहां 46 रातों तक ओजोन का स्तर सुरक्षित सीमा से ज्यादा पाया गया, जो पूरे देश में सबसे अधिक है। यह समस्या अब केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि चंडीगढ़, जयपुर, अहमदाबाद, मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहरों में भी तेजी से फैल रही है।

बढ़ता तापमान और तेज धूप वाहनों व फैक्ट्रियों से निकलने वाली गैसों के साथ मिलकर ओजोन बनाने की प्रक्रिया को तेज कर रहे हैं। यह ग्राउंड-लेवल ओजोन लोगों की सेहत के लिए बहुत खतरनाक है। इससे फेफड़ों को नुकसान, अस्थमा और सांस की बीमारियां हो सकती हैं, साथ ही दिल का दौरा और स्ट्रोक का खतरा भी बढ़ जाता है। पर्यावरण पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है, जिससे गेहूं की पैदावार में सालाना 14-15% की कमी आई है और हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।

मुख्य बिंदु विवरण
प्रभावित शहर दिल्ली-एनसीआर, जयपुर, अहमदाबाद, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु
खतरनाक प्रभाव फेफड़ों की बीमारी, अस्थमा, दिल का दौरा और स्ट्रोक
खेती पर असर गेहूं की पैदावार में 14-15% की कमी
मुख्य कारण तेज धूप, बढ़ता तापमान और वाहनों/उद्योगों का धुआं
विशेषज्ञ सुझाव NCAP 2.0 में बहु-प्रदूषक रणनीति और एयरशेड आधारित प्रबंधन

विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) केवल धूल और PM2.5 पर केंद्रित है। अब समय आ गया है कि NCAP 2.0 में ओजोन को एक प्रमुख प्रदूषक के रूप में शामिल किया जाए। उन्होंने सुझाव दिया है कि वाहनों, कारखानों और कचरा जलाने से निकलने वाली गैसों को नियंत्रित करना होगा और प्रदूषण प्रबंधन को राज्यों की सीमा से परे क्षेत्रीय ‘एयरशेड’ के आधार पर करना होगा।