Delhi: राजधानी दिल्ली के जिला कोर्टों में वकीलों के लिए ऑफिस यानी चैम्बर की भारी कमी हो गई है। शहर में करीब 1.7 लाख रजिस्टर्ड वकील हैं, लेकिन उनके बैठने के लिए सभी निचली अदालतों में मिलाकर सिर्फ 8,000 चैम्बर उपलब्ध हैं।
Delhi: राजधानी दिल्ली के जिला कोर्टों में वकीलों के लिए ऑफिस यानी चैम्बर की भारी कमी हो गई है। शहर में करीब 1.7 लाख रजिस्टर्ड वकील हैं, लेकिन उनके बैठने के लिए सभी निचली अदालतों में मिलाकर सिर्फ 8,000 चैम्बर उपलब्ध हैं। हालात इतने खराब हैं कि नए वकीलों को क्लाइंट से मिलने के लिए कोर्ट के गलियारों और कैंटीन का सहारा लेना पड़ रहा है।
कोर्ट कॉम्प्लेक्स में चैम्बर की क्या है स्थिति?
दिल्ली के अलग-अलग कोर्ट कॉम्प्लेक्स में जगह की कमी बहुत ज्यादा है। तीस हजारी कोर्ट में 12,000 वकीलों के लिए केवल 4,500 चैम्बर हैं। वहीं रोहिणी कोर्ट में 13,000 वकीलों के लिए सिर्फ 400 और द्वारका में 8,000 वकीलों के लिए मात्र 345 चैम्बर उपलब्ध हैं। { “Table”: [ { “कोर्ट”, “वकील”, “चैम्बर” }, { “तीस हजारी”, “12,000”, “4,500” }, { “करकरडूमा”, “16,000”, “800” }, { “रोहिणी”, “13,000”, “400” }, { “द्वारका”, “8,000”, “345” }, { “साकेत”, “-“, “700” } ] }
नियमों को लेकर कोर्ट में क्या चल रहा है?
Delhi High Court ने चैम्बर आवंटन के पुराने नियमों पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने दिसंबर 2025 में उस नियम पर आपत्ति जताई जिसमें रिटायर या मृत वकीलों के बच्चों या जीवनसाथी को प्राथमिकता दी जाती थी। कोर्ट का कहना है कि यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है। साथ ही, अप्रैल 2026 में यह साफ किया गया कि बतौर एसोसिएट चैम्बर इस्तेमाल करने वाले वकील का उस पर कोई स्थायी हक नहीं होता है।
विवाद और हिंसा की खबरें
चैम्बर की इस कमी ने तनाव बढ़ा दिया है। हाल ही में 11 मई 2026 को बुलंदशहर जिला कोर्ट परिसर में चैम्बर आवंटन को लेकर विवाद हुआ, जिसमें फायरिंग हुई और दो वकील घायल हो गए। फर्स्ट जनरेशन लॉयर्स एसोसिएशन के रुद्र विक्रम सिंह ने इन नियमों के खिलाफ हाईकोर्ट में PIL भी दाखिल की है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
दिल्ली में वकीलों के लिए चैम्बर की कमी क्यों है?
दिल्ली में वकीलों की संख्या तेजी से बढ़ी है। 2015 से 2025 के बीच करीब 1 लाख नए वकील जुड़े, जबकि आखिरी बार नए चैम्बरों का आवंटन 2012 में हुआ था।
हाईकोर्ट ने आवंटन नियमों पर क्या कहा है?
हाईकोर्ट ने परिवार के सदस्यों को मिलने वाली प्राथमिकता वाले नियम (Rule 5A) को चुनौती दी है और इसे समानता के अधिकार के खिलाफ बताया है।