Delhi के लाल डोरा गांवों में अब मिलेगी जमीन की रजिस्ट्री, स्वामित्व कार्ड से खत्म होंगे मालिकाना हक के विवाद

Delhi: दक्षिण दिल्ली के आलीशान मॉल और बड़ी कॉलोनियों के बीच बसे लाल डोरा गांव एक अलग ही दुनिया की तरह हैं। यहां की संकरी गलियां, जर्जर मकान और कानूनी उलझनें पीढ़ियों से लोगों की मुश्किल बढ़ा रही हैं। अब दिल्ली सरकार और क

Delhi: दक्षिण दिल्ली के आलीशान मॉल और बड़ी कॉलोनियों के बीच बसे लाल डोरा गांव एक अलग ही दुनिया की तरह हैं। यहां की संकरी गलियां, जर्जर मकान और कानूनी उलझनें पीढ़ियों से लोगों की मुश्किल बढ़ा रही हैं। अब दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार इन गांवों की सूरत बदलने और लोगों को उनकी जमीन का कानूनी हक दिलाने के लिए बड़ी तैयारी कर रही हैं।

लाल डोरा का मतलब उन आवासीय क्षेत्रों से है जिन्हें ब्रिटिश शासन के दौरान 1908 में कृषि भूमि से अलग करने के लिए नक्शे पर एक लाल रेखा खींची गई थी। लंबे समय तक इन इलाकों को नगर निगम के बिल्डिंग नियमों और संपत्ति कर से छूट मिली रही, लेकिन इसी वजह से यहां बिना किसी प्लानिंग के असुरक्षित निर्माण हुए। हाल ही में मालवीय नगर के हौज रानी इलाके के एक होटल में लगी आग ने इन गांवों में सुरक्षा और बुनियादी ढांचे की कमी को एक बार फिर उजागर कर दिया है।

इन समस्याओं को दूर करने के लिए केंद्र सरकार की ‘स्वामित्व योजना’ लागू की जा रही है। इसके तहत दिल्ली के 30 लाल डोरा गांवों में ड्रोन के जरिए सर्वे किया जा रहा है, जो अगले डेढ़ से दो महीने में पूरा हो जाएगा। सर्वे के बाद निवासियों को डिजिटल स्वामित्व कार्ड दिए जाएंगे। इन कार्ड्स की मदद से लोग अपनी संपत्ति के असली मालिक साबित कर सकेंगे, जिससे जमीन के विवाद खत्म होंगे और बैंक से लोन लेना आसान हो जाएगा।

विकास की दिशा में कुछ और बड़े कदम भी उठाए गए हैं। कैबिनेट मंत्री प्रवेश साहिब सिंह ने बताया है कि दिल्ली के 40 गांव अब शहरी क्षेत्र में बदलेंगे। साथ ही मास्टर प्लान 2041 के तहत लाल डोरा की पहली रजिस्ट्री पूरी तरह मुफ्त होगी। सितंबर 2020 में उपराज्यपाल ने इन गांवों को DDA को सौंप दिया था, जिससे अब कुल 362 लाल डोरा गांव DDA के दायरे में आ गए हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन इलाकों में अभी भी सीवेज, पानी की आपूर्ति और सड़कों जैसी बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है। संकरी गलियों की वजह से आपातकालीन सेवाएं जैसे फायर ब्रिगेड या एम्बुलेंस का अंदर पहुंचना मुश्किल होता है। इतिहासकार सुहैल हाशमी के मुताबिक, दिल्ली सरकार के पास इन जमीनों और प्रशासनिक अधिकारों पर सीधा नियंत्रण न होना भी एक बड़ी चुनौती रही है, जिसके लिए केंद्र की अनुमति जरूरी होती है।