Delhi: दिल्ली हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान और उनके सरकारी दस्तावेजों में नाम दर्ज करने के मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने कहा है कि इस फैसले का असर भविष्य में कई सरकारी रिकॉर्ड्स पर पड़े
Delhi: दिल्ली हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान और उनके सरकारी दस्तावेजों में नाम दर्ज करने के मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने कहा है कि इस फैसले का असर भविष्य में कई सरकारी रिकॉर्ड्स पर पड़ेगा। जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की बेंच ने इस मामले में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय (MoSJE) को भी पार्टी बनाया है।
दस्तावेजों में पहचान को लेकर क्या है विवाद?
यह पूरा मामला इस बात पर है कि यूनिवर्सिटी ऑफ दिल्ली और CBSE जैसे संस्थानों द्वारा जारी सर्टिफिकेट में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान कैसे दर्ज की जाती है। कोर्ट ने माना कि अगर इस पर कोई दिशा-निर्देश आते हैं, तो उसका असर इन कागजों पर पड़ेगा:
- जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र
- पासपोर्ट और आधार कार्ड
- ड्राइविंग लाइसेंस
- शैक्षिक डिग्री और सर्टिफिकेट
2026 के नए कानून पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
याचिकाकर्ताओं ने ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026’ को चुनौती दी है। उनका कहना है कि यह नया कानून उनकी बुनियादी आजादी को कम करता है। पहले लोग अपनी पहचान खुद तय कर सकते थे, लेकिन अब इसे सरकारी वेरिफिकेशन और सर्टिफिकेट के दायरे में लाया गया है, जो कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने NALSA फैसले के खिलाफ है।
आगे क्या होगा और अगली सुनवाई कब है?
कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह छह हफ्ते के भीतर अपना हलफनामा दाखिल करे। सरकार को यह छूट भी दी गई है कि वह इस मुद्दे पर अन्य संबंधित मंत्रालयों से सलाह ले सके ताकि एक सही और पूरा फ्रेमवर्क तैयार किया जा सके। इस मामले की अगली सुनवाई 15 जुलाई 2026 को तय की गई है।