Delhi: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ‘Right to Be Forgotten’ यानी ‘भूल जाने के अधिकार’ को मान्यता दे दी है। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की निजी जानकारी इंटरनेट पर हमेशा के लिए
Delhi: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ‘Right to Be Forgotten’ यानी ‘भूल जाने के अधिकार’ को मान्यता दे दी है। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की निजी जानकारी इंटरनेट पर हमेशा के लिए मौजूद नहीं रहनी चाहिए, क्योंकि इससे उसकी बदनामी हो सकती है और निजी जीवन पर बुरा असर पड़ता है। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राइवेसी के मौलिक अधिकार का हिस्सा है।
क्या है Right to Be Forgotten और यह कैसे काम करेगा?
जस्टिस सचिन दत्ता ने 144 पन्नों के फैसले में साफ किया कि डिजिटल दौर में लोगों का अपनी निजी जानकारी पर कंट्रोल होना जरूरी है। अब ऐसे लोग जिनके नाम कोर्ट के पुराने रिकॉर्ड्स या इंटरनेट सर्च में आते हैं और इससे उनकी इज्जत को नुकसान पहुँच रहा है, वे उसे हटाने की मांग कर सकते हैं। यह नियम खासकर उन लोगों के लिए मददगार होगा जिन्हें कोर्ट ने बरी कर दिया है या जिनके पारिवारिक विवाद खत्म हो चुके हैं।
किन प्लेटफॉर्म्स पर होगा असर और क्या हैं शर्तें?
इस फैसले का सीधा असर Google जैसे सर्च इंजन और Indian Kanoon जैसे कानूनी वेबसाइटों पर पड़ेगा। अब इन प्लेटफॉर्म्स को निजी जानकारी को डी-इंडेक्स करने या मास्क करने (छुपाने) के अनुरोधों पर विचार करना होगा। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि प्राइवेसी के साथ-साथ प्रेस की आजादी और जनता के जानने के अधिकार के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। जानकारी तभी हटाई जाएगी जब वह अब जरूरी न हो और उससे व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुँच रही हो।
पुराने कानूनों और नए नियमों का क्या है संबंध?
यह फैसला 2017 के के.एस. पुट्टास्वामी केस के बाद आया है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने प्राइवेसी को मौलिक अधिकार माना था। साथ ही, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 की धारा 12 में भी ‘Right of Erasure’ यानी डेटा मिटाने के अधिकार की बात कही गई है। दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला अब इस प्रक्रिया को और स्पष्ट बनाता है ताकि आम आदमी अपनी डिजिटल पहचान को सुरक्षित रख सके।
Frequently Asked Questions (FAQs)
Right to Be Forgotten का आम आदमी को क्या फायदा होगा?
इससे उन लोगों को राहत मिलेगी जिनका नाम पुराने अदालती मामलों या इंटरनेट रिकॉर्ड्स की वजह से बदनाम हो रहा है। अब वे अपनी ऐसी निजी जानकारी को इंटरनेट से हटवाने या छुपाने की मांग कर सकते हैं जो अब जरूरी नहीं है।
क्या इंटरनेट से कोई भी जानकारी आसानी से हटाई जा सकती है?
नहीं, कोर्ट ने संतुलन की बात कही है। जानकारी तभी हटाई जाएगी जब वह व्यक्ति की प्राइवेसी और गरिमा को नुकसान पहुँचा रही हो और उसका कोई सार्वजनिक महत्व न बचा हो।