Delhi High Court ने केंद्र सरकार को फटकारा, कहा- स्वायत्त संस्थाओं को सरकारी विभाग की तरह चलाना गलत

Delhi: दिल्ली हाई कोर्ट ने वन्यजीव पैनल से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि सरकार की यह आदत बन गई है कि वह हर वैधानिक संस्था (Statutory Body) को अपने हाथ का खिलौना या

Delhi: दिल्ली हाई कोर्ट ने वन्यजीव पैनल से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि सरकार की यह आदत बन गई है कि वह हर वैधानिक संस्था (Statutory Body) को अपने हाथ का खिलौना या सरकारी विभाग की तरह इस्तेमाल करती है। यह टिप्पणी बुधवार, 8 जुलाई 2026 को नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ (NBWL) से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आई।

चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने साफ किया कि वैधानिक संस्थाएं सरकार से अलग और स्वतंत्र होती हैं। कोर्ट ने कहा कि सरकार द्वारा हर शक्ति को अपने हाथ में लेना चिंताजनक है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्या वह एक वैधानिक बोर्ड और अपने खुद के कामकाज के बीच का अंतर समझती है। अदालत ने जोर दिया कि बोर्ड एक अलग इकाई है और इसे सरकारी विभाग की तरह काम नहीं करना चाहिए।

यह पूरा मामला एक PIL से जुड़ा है, जिसे रिटायर्ड IFS और IAS अधिकारियों समेत संरक्षणवादियों के एक समूह ने दायर किया है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि NBWL की स्टैंडिंग कमेटी केवल एक ‘क्लियरिंग हाउस’ बन गई है, जो बिना किसी वैज्ञानिक जांच या पारदर्शिता के संरक्षित क्षेत्रों की जमीन को डायवर्ट करने वाले प्रस्तावों को मंजूरी दे देती है। आरोप है कि 2014 से 2026 के बीच 97% से ज्यादा ऐसे प्रस्तावों को पास कर दिया गया। याचिका में यह भी कहा गया कि कानूनन हर साल मिलने वाले NBWL की बैठक 13 साल के लंबे अंतराल के बाद 2025 में हुई।

कोर्ट ने अब केंद्र सरकार को चार हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। सरकार को 18 अगस्त तक अपना विस्तृत जवाब देना होगा और इस मामले की अगली सुनवाई सितंबर में होगी। दिलचस्प बात यह है कि जिस दिन कोर्ट में यह सुनवाई चल रही थी, उसी दिन कोयंबटूर में स्टैंडिंग कमेटी की 91वीं बैठक भी हो रही थी, जिसकी अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने की।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को नष्ट करना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, जो नागरिकों को स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार देता है। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के तहत बोर्ड को यह बताना जरूरी है कि जमीन के इस्तेमाल से वन्यजीवों को क्या फायदा होगा, लेकिन याचिका में दावा किया गया है कि नियमों की अनदेखी की जा रही है।