Delhi: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि अगर कोई बच्चा पूरी तरह से अपनी मां या पिता में से किसी एक की देखरेख में है, तो पासपोर्ट बनवाने के लिए दूसरे अभिभावक का नाम देना जरूरी नहीं है। कोर्ट ने साफ किय
Delhi: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि अगर कोई बच्चा पूरी तरह से अपनी मां या पिता में से किसी एक की देखरेख में है, तो पासपोर्ट बनवाने के लिए दूसरे अभिभावक का नाम देना जरूरी नहीं है। कोर्ट ने साफ किया कि अगर पिता ने अपने अधिकार छोड़ दिए हैं, तो जबरदस्ती उनका नाम जोड़ने की जरूरत नहीं है। यह फैसला उन एकल माता-पिता के लिए बड़ी राहत है जो कागजी कार्रवाई में फंस जाते थे।
पासपोर्ट के लिए नया नियम क्या है
जस्टिस पुरुषैंद्र कुमार कौरव की पीठ ने 9 अप्रैल, 2026 को यह आदेश दिया। कोर्ट ने एक पांच साल की बच्ची की मां की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि नियमों को बहुत सख्ती से लागू नहीं करना चाहिए। सबसे जरूरी बच्चे का हित होना चाहिए। अगर हालात ऐसे हैं कि पिता का नाम नहीं जोड़ा जा सकता, तो पासपोर्ट अधिकारी को बिना पिता के नाम के पासपोर्ट जारी करना होगा।
किन परिस्थितियों में मिलेगी यह राहत
- जब बच्चा पूरी तरह से किसी एक अभिभावक के संरक्षण में हो।
- अगर पिता ने कानूनी तौर पर बच्चे पर अपने अधिकार छोड़ दिए हों।
- जब माता-पिता के बीच तलाक हो चुका हो और समझौते में पिता ने मिलने की इच्छा न जताई हो।
- पासपोर्ट मैनुअल 2020 और विदेश मंत्रालय के दिशा-निर्देश भी ऐसे प्रावधानों की अनुमति देते हैं।
कोर्ट के पुराने फैसलों का क्या है असर
यह फैसला पहले दिए गए कई आदेशों की पुष्टि करता है। मई 2023 में जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह ने भी कहा था कि अगर पिता ने बच्चे को त्याग दिया है, तो नाम हटाया जा सकता है। इससे पहले 20 मई, 2016 को भी कोर्ट ने माना था कि खास मामलों में सिर्फ मां के हस्ताक्षर पासपोर्ट जारी करने के लिए काफी हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘एकल माता-पिता’ शब्द का मतलब व्यापक है और इसे लचीले तरीके से देखा जाना चाहिए।