Delhi HC की बड़ी टिप्पणी, कहा- प्रेस की आजादी का मतलब गैर-जिम्मेदाराना पत्रकारिता की ढाल बनना नहीं

Delhi: दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रेस की आजादी को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया कि लोकतंत्र में प्रेस की आजादी बहुत जरूरी है, लेकिन इसका इस्तेमाल गैर-जिम्मेदाराना पत्रकारिता, डराने-धमकाने या समाज में अशांति फ

Delhi: दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रेस की आजादी को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया कि लोकतंत्र में प्रेस की आजादी बहुत जरूरी है, लेकिन इसका इस्तेमाल गैर-जिम्मेदाराना पत्रकारिता, डराने-धमकाने या समाज में अशांति फैलाने के लिए नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी जस्टिस गिरीश कथपालिया ने दो आरोपियों को जमानत देते हुए की।

यह पूरा मामला दिल्ली के सीमपुरी इलाके की एक अनधिकृत कॉलोनी का है। यहाँ 4 जुलाई 2025 को दो फ्रीलांस YouTube रिपोर्टर्स के साथ मारपीट का आरोप लगा था। इस मामले में आरोपी आबिद अली और फुरकान 5 जुलाई 2025 से जेल में थे। गुरुवार, 16 जुलाई 2026 को कोर्ट ने इन दोनों को नियमित जमानत दे दी।

सुनवाई के दौरान जस्टिस कथपालिया ने डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि आजकल मोबाइल और माइक लेकर कोई भी खुद को रिपोर्टर बताने लगता है, जबकि उनके पास न तो पत्रकारिता की ट्रेनिंग होती है और न ही नैतिकता की समझ। कोर्ट ने सुझाव दिया कि सरकार को एक ऐसा रेगुलेटरी फ्रेमवर्क तैयार करना चाहिए जिससे प्रेस की आजादी भी बनी रहे और रिपोर्टर्स की जवाबदेही भी तय हो। कोर्ट ने बिना जांच के आरोप लगाने और सनसनी फैलाने वाली खबरों से बचने की सलाह दी क्योंकि इससे समाज में बंटवारा और गड़बड़ी पैदा होती है।

इस मामले में सरकारी वकील ने दलील दी थी कि यह हमला प्रेस की आजादी पर हमला है। हालांकि, कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई और कहा कि जमानत की प्रक्रिया में पुलिस ने ठीक से मदद नहीं की और जानकारी में विसंगतियां थीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी केवल जमानत देने के उद्देश्य से की गई है।